किशनगढ़ (अजमेर)। भारतीय संस्कृति, सनातन प्रवाह और मूल्य आधारित शिक्षा के संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारतीय शिक्षण मंडल एवं राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय “परिचायक वर्ग” का सफलतापूर्वक समापन हो गया है। 16 व 17 मई को आयोजित इस उच्च स्तरीय शैक्षिक एवं संगठनात्मक समागम में शिक्षा, संस्कृति तथा संगठनात्मक कार्यों से जुड़े अनेक शिक्षकों, शोधार्थियों एवं कार्यकर्ताओं ने अत्यंत उत्साहपूर्वक सहभागिता कर राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया।

इस भव्य कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ 16 मई को पंजीकरण एवं परिचय सत्र के साथ हुआ। प्रथम दिवस के सत्रों में उपस्थित प्रतिभागियों को भारतीय शिक्षण मंडल के मूल उद्देश्यों, संगठन की विस्तृत कार्यप्रणाली तथा आत्मावलोकन एवं दैनिक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर मार्गदर्शन प्रदान किया गया। इस वैचारिक मंथन के दौरान प्रतिभागियों को अपने व्यवहार, विचार एवं कार्यों का गहन आत्ममूल्यांकन करने तथा समाज हित में किए जा रहे श्रेष्ठ कार्यों को और अधिक प्रभावी व सुदृढ़ बनाने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया गया।

आयोजन के द्वितीय दिवस का प्रारम्भ प्रातः जागरण, एकात्मता स्त्रोत के पाठ एवं एकाग्रता आधारित योग साधना के साथ हुआ, जिसके पश्चात विभिन्न अकादमिक व वैचारिक विषयों पर गहन सत्र आयोजित किए गए। द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में वर्गाधिकारी प्रो. (श्री) आनंद भालेरावजी (कुलपति, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय) ने अपनी प्रस्तावना में मार्गदर्शन देते हुए स्पष्ट किया कि एक चरित्रवान व्यक्ति ही राष्ट्र निर्माण में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और इस प्रकार के गरिमामयी कार्यक्रम समाज में चरित्र निर्माण की सुदृढ़ आधारशिला रखते हैं। इसी सत्र को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम के वर्गसंचालक एवं अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. (श्री) संजय पाठकजी ने “भारतीय शिक्षा दर्शन” विषय पर अपना विस्तृत एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत किया। डॉ. पाठकजी ने जोर देकर कहा कि संगठन से जुड़ने पर व्यक्ति अपूर्णता से पूर्णता की ओर निरंतर अग्रसर होता है तथा संगठन वास्तव में एक सनातन प्रवाह है। उन्होंने समकालीन शिक्षा के क्षेत्र में श्रवण, चिंतन एवं वैज्ञानिक विश्लेषण की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी विशेष प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में डॉ. जय प्रकाश त्रिपाठीजी (प्रांत सहमंत्री) ने संगठन के कार्य, आगामी कार्यक्रमों एवं विभिन्न गतिविधियों की प्रामाणिक जानकारी साझा की। इसके तुरंत बाद आयोजित अभ्यास कालांश में उपस्थित सभी संभागियों को ध्येय श्लोक, ध्येय वाक्य एवं संगठन गीत का सस्वर अभ्यास कराया गया। इसके बाद, तृतीय सत्र में चित्तौड़ प्रांत के उपाध्यक्ष डॉ. (श्री) अनिल गुप्ताजी ने उत्सव, कार्यकर्ता विकास, संगठन की विशिष्ट कार्यपद्धति एवं अध्ययन समूहों की भूमिका पर अपने गंभीर विचार व्यक्त किए। डॉ. गुप्ताजी ने बताया कि भारतीय शिक्षण मंडल के अंतर्गत प्रतिवर्ष छह प्रमुख वार्षिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं और उन्होंने इन सभी उत्सवों के दार्शनिक व सामाजिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके पश्चात, चतुर्थ सत्र में प्रत्यक्ष मंडल का गरिमापूर्ण आयोजन किया गया।

इस दो दिवसीय आयोजन के समापन सत्र में माननीय कुलपति प्रो. (श्री) आनंद भालेरावजी एवं अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. (श्री) संजय पाठकजी ने पुनः संयुक्त रूप से प्रतिभागियों को संबोधित किया और देश की समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा तथा मूल्य आधारित शिक्षा की समकालीन आवश्यकता पर विशेष बल दिया। कार्यक्रम के विभिन्न वैचारिक सत्रों का कुशल मंच संचालन डॉ प्रमोद कांबले, डॉ धनंजय तिवारी और डॉ गजानन सर्वज्ञ द्वारा किया गया। अंत में, डॉ ज्ञान रंजन पांडा द्वारा दिए गए औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ इस भव्य कार्यक्रम का विधिवत समापन हुआ। समापन के अंतिम क्षणों में सभी शिक्षक, शोधार्थी और कार्यकर्ता प्रतिभागियों ने भारतीय संस्कृति एवं सनातन शिक्षा के शाश्वत मूल्यों को समाज के अंतिम छोर तक पहुँचाने का दृढ़ संकल्प लिया।

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Pratahkal Newsroom

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