जयपुर, 29 जून। राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने जयपुर स्थित पूर्णिमा विश्वविद्यालय में विद्याभारती के सहयोग से आयोजित पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ किया। "भारतीय ज्ञान परंपरा-पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक शिक्षा, शोध और नवाचार" विषयक इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि प्राचीन भारत में आठ लाख गुरुकुल संचालित थे, जहाँ विद्यार्थियों को व्यावहारिक जीवन के लिए 18 विद्याओं और 64 कलाओं का ज्ञान प्रदान किया जाता था। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय ही भारत के सर्वांगीण विकास की राह प्रशस्त करेगा।

राज्यपाल ने नैतिकता को प्राचीन शिक्षा प्रणाली का सर्वोच्च आधार बताते हुए कहा कि तत्कालीन शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह समग्र जीवन से जुड़ी थी। उन्होंने 16वीं शताब्दी के महाराणा प्रताप के दरबारी लेखक चक्रपाणी मिश्र द्वारा रचित "विश्व वल्लभ" ग्रन्थ का विशेष उल्लेख किया। राज्यपाल के अनुसार, इस ग्रन्थ में भू-जल खोज, मौसम भविष्यवाणी, जल शुद्धिकरण, कुंड निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, बागवानी और उन्नत कृषि तकनीक संबंधी विरल जानकारियां निहित हैं, जो आज के आधुनिक विज्ञान के समकक्ष हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की ज्ञान परंपरा युगों से ही ऐसी उपयोगी तकनीकों से समृद्ध रही है।

श्री बागडे ने वैदिक परंपरा का स्मरण करते हुए कहा कि प्रभु राम ने भी गुरुकुल पद्धति से ही शिक्षा प्राप्त कर मर्यादा पुरुषोत्तम का पद पाया। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अहिंसा का प्रतिकार करना और हिंसा का समुचित उत्तर देना ही हमारे समाज की रक्षा का मार्ग है। अंग्रेजों द्वारा भारत पर शासन के दौरान निकाले गए गजेटियर का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने बताया कि उस समय भारत की सीमाएं आज के पाकिस्तान, म्यांमार और श्रीलंका तक विस्तृत थीं और गुरुकुलों में शिक्षा पूर्णतः निशुल्क थी, जिसका खर्च आम जनमानस के सहयोग से चलता था। उन्होंने रणकपुर के जैन मंदिरों को उत्कृष्ट कला कौशल का प्रमाण बताया।

राज्यपाल ने मैकाले की शिक्षा नीति को भारत की समृद्ध नैतिक विरासत और गौरवशाली परंपरा को नष्ट करने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि इसी नीति के तहत देश के उद्योग-धंधे बंद कर निवासियों को दरिद्र बनाया गया। महर्षि कणाद द्वारा सदियों पहले अणु-परमाणु का ज्ञान देने और भारत से दशमलव पद्धति की शुरुआत होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिम के टुकड़ों में ज्ञान देने के विपरीत भारत हमेशा से समग्र विज्ञान से जुड़ा रहा है। अंत में, उन्होंने बप्पा रावल के शौर्य का स्मरण करते हुए महर्षि अरविंद घोष के चिंतन के आलोक में विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता, संयम और नैतिक मूल्यों को विकसित करने का आह्वान किया। कार्यक्रम में सांसद श्री मदन राठौड़ ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी था और आज हमारे पुराणों में वर्णित तकनीक का वैज्ञानिक आधार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इससे पूर्व अतिथियों ने कार्यक्रम के पोस्टर का विमोचन किया और पूर्णिमा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष श्री शशिकांत सिंधी ने शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।

Pratahkal Newsroom

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