गौमाता नहीं रहेगी तो गोपाल कहां से आएंगे? संत दिग्विजयराम महाराज ने जताई चिंता
कालिका गोशाला में आयोजित कथा में संत दिग्विजयराम और अनुजदास ने गोसेवा, भक्ति व श्रद्धा पर विचार रखे और 17 दिसंबर को ज्ञापन देने का संकल्प लिया।

संत दिग्विजयराम बड़ी सादड़ी स्थित गोशाला में श्रद्धालुओं के साथ गोसेवा करते हुए दिख रहे हैं।
बड़ी सादड़ी के नेतावल गढ़ पाछली गांव स्थित कालिका गोशाला में आयोजित नानी बाई का मायरा कथा के दौरान संत दिग्विजयराम महाराज ने गौमाता की दुर्दशा, गोहत्या और भक्ति में श्रद्धा के महत्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज गौमाता की दुर्दशा हो रही है। जब गौमाता ही नहीं रहेगी तो गोपाल कहां से आएंगे। भक्ति और आध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए विश्वास, श्रद्धा और निष्ठा जरूरी है। जब तक अंतरमन जागृत नहीं होगा, तब तक भगवत मार्ग पर अग्रसर होना संभव नहीं है।
व्यासपीठ से कथा वाचन करते हुए संत दिग्विजयराम महाराज ने नरसिंह भगत की भक्ति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि नरसिंह भगत ने बारह पीढ़ी तक चलने वाला धन बारह माह में दान कर दिया और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो गए। उनकी भक्ति और श्रद्धा ऐसी थी कि श्री सांवलिया सेठ को बावन बार धरती पर आना पड़ा। उन्होंने गोपियों के भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि गोपियों को केवल श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा थी। गोपी शब्द न तो स्त्री है और न ही किसी वस्त्र का नाम, बल्कि यह भाव और श्रद्धा का प्रतीक है।
संत ने कहा कि नरसिंह भगत और भक्त शिरोमणि मीरा बाई की मनःस्थिति किसी भी परिस्थिति में नहीं बदली। जिसका मन निर्मल होता है, उसे प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। कथा के दौरान उन्होंने नरसिंह भगत की टूटी हुई गाड़ी ठीक करने के लिए खाती का रूप धारण कर आए श्री सांवलिया सेठ का प्रसंग सुनाया, जिससे श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। उन्होंने बताया कि नानी बाई का मायरा भरने के लिए नरसिंह भगत ने केदारा राग गाकर भगवान श्रीकृष्ण को याद किया था।
संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि आध्यात्म तर्क नहीं, बल्कि श्रद्धा का विषय है। प्रभु श्रीराम का उल्टा नाम जपकर भी वाल्मीकि ब्रह्म ऋषि बन गए। भक्तों की चिंता भगवान करते हैं। कथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है और श्रद्धालुओं को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
गौमाता की दुर्दशा और उस पर हो रहे अत्याचारों को महापाप बताते हुए संत ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण को गौमाता से बहुत लगाव है। जहां गौमाता का वास होता है, वहां वास्तु दोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है और तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है और वह सभी प्रकार के सुख प्रदान करने वाली है। इसके बावजूद आज देश में गौमाता की दुर्दशा होना विडंबना है। उन्होंने गौमाता के संरक्षण और उसके प्रति श्रद्धा के महत्व पर जोर दिया।
गौमाता को राष्ट्रीय माता का दर्जा देने का संकल्प
कथा के दौरान श्रीसांवलिया धाम मुंगाना के संत अनुजदास ने भी गौमाता की सेवा और संरक्षण को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि ब्रह्माण्ड के कल्याण के लिए भगवती गौमाता की सेवा बहुत जरूरी है। हमारे देश में जितना संकट गौमाता पर है, उतना कहीं भी नहीं है। भारत की भूमि जब तक गोहत्या के कलंक से मुक्त नहीं होगी, तब तक रामराज्य नहीं आएगा।
संत अनुजदास ने गौमाता को राष्ट्रीय माता का दर्जा देने की मांग को लेकर आगामी सत्रह दिसंबर को देश के प्रत्येक राज्य की राजधानी में सरकार के नाम प्रार्थना पत्र देने की घोषणा की। इस दौरान संत रामपाल ने भी गौमाता की दुर्दशा को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। कालिका गोशाला में आयोजित कथा में संतों ने भक्ति, श्रद्धा, गौसेवा और गोहत्या से मुक्ति के विषयों पर विचार रखे तथा गौमाता को राष्ट्रीय माता का दर्जा दिलाने की मांग को प्रमुखता से उठाया।

