आचार्य वर्धमान सागर का जयपुर में संदेश, आत्मकल्याण को बताया जीवन का लक्ष्य
चंद्रपुरी दिगंबर जैन मंदिर बड़ के बालाजी में धार्मिक पाठशाला के दौरान धर्मसभा का आयोजन, अशोक पाटनी सहित कई गणमान्य समाज श्रेष्ठियों ने लिया आशीर्वाद।

राजधानी के अजमेर रोड़ स्थित चंद्रपुरी दिगंबर जैन मंदिर बड़ के बालाजी में परम पूज्य आचार्य वर्धमान सागर महाराज ससंघ के पावन प्रवास के दौरान धर्म और अध्यात्म की अभूतपूर्व त्रिवेणी बह रही है। इस पावन अवसर पर मंदिर परिसर में प्रतिदिन भव्य धार्मिक पाठशाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक और श्राविकाएं सम्मिलित होकर ज्ञान गंगा का रसपान कर रहे हैं। पाठशाला के अंतर्गत आयोजित अत्यंत प्रभावक धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य वर्धमान सागर महाराज ने समूची मानव जाति को झकझोरने वाला गंभीर संदेश दिया। उन्होंने अत्यंत ओजस्वी वाणी में श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हुए उद्घोषित किया कि मनुष्य जीवन केवल सांसारिक भोग-विलास और क्षणभंगुर सुखों के उपभोग के लिए नहीं मिला है, बल्कि इस दुर्लभ जीवन का वास्तविक और सबसे बड़ा लक्ष्य अपनी अंतरात्मा को समझना, सत्कर्म करना तथा आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करना है। आचार्य श्री ने कर्म सिद्धांत की गूढ़ व्याख्या करते हुए चेतावनी दी कि क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, लोभ और मोह जैसे तीव्र विकार ही जीव के साथ निरंतर बुरे कर्मों का बंधन करते हैं, इसलिए प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति को सदैव अपने मन, वचन और व्यवहार को पूर्णतः शुद्ध तथा पवित्र बनाने का दृढ़ प्रयास करना चाहिए। इस अलौकिक आध्यात्मिक समागम के दौरान समाज रत्न अशोक पाटनी (आरके मार्बल), श्रीपाल - भागचंद चूड़ीवाल, सीए राजेश सेठी और प्रवीण बडजात्या सहित अनेकों गणमान्य समाज श्रेष्ठियों ने धर्मसभा में सहभागिता की और आचार्य संघ के चरणों में शीश नवाकर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
आचार्य श्री ने अपने दिव्य प्रवचन को विस्तार देते हुए स्पष्ट किया कि सांसारिक और बाहरी वस्तुओं से प्राप्त होने वाला भौतिक सुख अत्यंत क्षणिक और नश्वर होता है, जबकि वास्तविक एवं शाश्वत सुख केवल आत्मा की परम पवित्रता और अंतःकरण की अगाध शांति में ही समाहित है। उन्होंने तीर्थंकर भगवान के आदर्श जीवन का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि भगवान इसलिए महान और पूजनीय हैं क्योंकि उन्होंने राग-द्वेष, अहंकार और मोह का सर्वथा त्याग करके अपनी आत्मा को पूर्णतः शुद्ध कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप ही उन्हें अनंत ज्ञान और शाश्वत शांति की प्राप्ति हुई। दिव्य समवसरण के अलौकिक महत्व पर विशेष प्रकाश डालते हुए आचार्य प्रवर ने कहा कि भगवान के समवसरण की यह अनुपम विशेषता है कि वहां तिर्यंच से लेकर मानव तक सभी जीव पूर्णतः समान माने जाते हैं। उस पावन धरा पर किसी भी प्रकार का वैर-विरोध, वैमनस्य या भेदभाव तनिक भी विद्यमान नहीं रहता, बल्कि सर्वत्र केवल असीम प्रेम, करुणा और विश्व शांति का वात्सल्यमयी वातावरण जीवंत रहता है। यह समवसरण संदेश वर्तमान समाज में आपसी सद्भाव, परस्पर सौहार्द और भाईचारे की जड़ों को सुदृढ़ करने की महती प्रेरणा देता है।
धर्म की व्यावहारिक परिभाषा को अत्यंत सरलता से रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म केवल क्रियाकांड, बाह्य पूजा-पाठ या किसी भी प्रकार के दिखावे का नाम नहीं है, बल्कि जीवन में श्रेष्ठ व्यवहार, पूर्ण संयम, अगाध विनम्रता और संसार के किसी भी छोटे-बड़े जीव को तनिक भी कष्ट न देने की परम पवित्र भावना ही वास्तव में सच्चा धर्म है। उन्होंने वर्तमान परिवेश पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के तीव्र गति वाले समय में मनुष्य का मन अत्यधिक भटकता है, अतः इस चंचल मन को शांत, नियंत्रित और स्थिर रखना ही आज के युग की सबसे बड़ी और सच्ची साधना है। आचार्य श्री ने अहंकार को मानव जीवन का सबसे विनाशकारी दोष निरूपित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को सर्वज्ञ अर्थात सब कुछ जानने वाला मान लेता है, वह जीवन में आगे सीखने की अपनी मूलभूत क्षमता को सदैव के लिए खो देता है, इसके विपरीत केवल एक विनम्र व्यक्ति ही ज्ञानार्जन कर जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचता है। उन्होंने दिगंबर साधु-संतों के चर्या प्रधान जीवन को सर्वस्व त्याग, घोर तप और कठोर आत्मसंयम का अनुपम आदर्श बताते हुए कहा कि जीवन की विकट और कठिनतम परिस्थितियों में भी स्वयं को पूर्णतः शांत और संयमित बनाए रखना ही वास्तविक आंतरिक साधना की कसौटी है।
प्रवचन के गौरवमयी समापन पर आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने उपस्थित जनमेदिनी और समस्त श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण का अंतिम पावन संदेश देते हुए आह्वान किया कि सृष्टि के सभी छोटे-बड़े जीवों से निश्छल प्रेम करें, विनाशकारी क्रोध और अहंकार का पूर्णतः परित्याग करें, अपने मन को विकारों से रहित व पवित्र बनाएं तथा धर्म को केवल मंदिर की चौखट तक सीमित न रखकर उसे अपने दैनिक आचरण व संपूर्ण जीवन में अनिवार्य रूप से उतारें। उन्होंने अंत में सुस्पष्ट किया कि आत्मा की परम शुद्धि और समस्त राग-द्वेष से सर्वथा मुक्त जीवन जीना ही शाश्वत मोक्ष का एकमात्र वास्तविक मार्ग है। इस संपूर्ण गरिमामयी कार्यक्रम की व्यापक व्यवस्थाएं और सूचना प्रसार चंद्रपुरी दिगंबर जैन मंदिर समिति, बढ़ के बालाजी, अजमेर रोड़, जयपुर के प्रचार संयोजक अभिषेक जैन बिट्टू (मो.- 9829566545) द्वारा सुचारू रूप से सुनिश्चित की जा रही हैं।

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