जयपुर, 19 जनवरी 2026: गुलाबी नगरी जयपुर की फिजाओं में घुली साहित्य की खुशबू और वैचारिक विमर्श के बीच 'जयपुर बुकमार्क' के शानदार 13वें संस्करण का भव्य समापन हो गया। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के समानांतर आयोजित होने वाले दक्षिण एशिया के इस सबसे बड़े प्रकाशन सम्मेलन ने अपने अंतिम दिन न केवल व्यापारिक बारीकियों को छुआ, बल्कि भारतीय सभ्यता की उन गहराइयों को भी खंगाला जो सदियों से हमारी पहचान बनी हुई हैं। ब्लूवन इंक द्वारा प्रस्तुत इस पांच दिवसीय आयोजन ने दुनिया भर के प्रकाशकों, संपादकों और बुद्धिजीवियों को एक ऐसे मंच पर लाकर खड़ा किया, जहां किताबों का भविष्य और संस्कृति की निरंतरता ही केंद्र बिंदु रही।

दिन की सबसे चर्चित चर्चा 'रीडिफ़ाइनिंग बेस्टसेलर्स: व्हाट इज़ सेलिंग इन द इंडियन मार्केट्स' सत्र से शुरू हुई, जिसने आज के दौर में सफलता के नए पैमानों को परिभाषित किया। मीता कपूर के कुशल संचालन में अनिरुद्ध चक्रवर्ती, मिली ऐश्वर्या, सक्षम गर्ग, शैलेश भरतवासी और स्वाति चोपड़ा जैसे दिग्गजों ने इस पहेली को सुलझाने का प्रयास किया कि आखिर एक किताब 'बेस्टसेलर' कैसे बनती है। इस संवाद में उभरकर आया कि आज के दौर में मार्केटिंग की रणनीति सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया की सक्रियता, रिटेलर्स के साथ तालमेल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की पहुंच ही किसी कृति को लंबी उम्र देती है। पैनल ने पायरेसी की चुनौती, कम संख्या वाली डिजिटल प्रिंटिंग की सुगमता और विशेष रूप से 'नई हिंदी' व क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति पाठकों के बढ़ते रुझान पर गंभीर मंथन किया।

दोपहर के सत्र में नमिता गोखले द्वारा पेश किए गए 'इंडोलॉजी: शेड्स एंड लेयर्स ऑफ़ अ सिविलाइज़ेशन' सत्र ने इतिहास के पन्नों को जीवंत कर दिया। तमिलनाडु टेक्स्टबुक एंड एजुकेशनल सर्विसेज़ कॉरपोरेशन के सौजन्य से आयोजित इस विमर्श में विद्वान आर. बालकृष्णन और टी. एस. सरवनन ने भारत के सांस्कृतिक मानचित्र की परतें खोलीं। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास की जीती और हारी गई लड़ाइयों का जीवंत दस्तावेज है। बालकृष्णन ने भारत की तुलना एक विशाल 'वर्षा-वन' से करते हुए इंडस वैली सिविलाइज़ेशन और संगम साहित्य के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने 'इंडस पोंगल' जैसे उदाहरणों से समझाया कि कैसे सिंधु घाटी के प्रतीक आज भी तमिलनाडु की पारंपरिक रंगोली में जीवित हैं, जो हमारी अटूट सभ्यतागत विरासत का प्रमाण है।

आयोजन का समापन एक गरिमामयी 'फेस्टिवल डायरेक्टर्स राउंडटेबल' के साथ हुआ, जिसकी कमान संजॉय के. रॉय के हाथों में थी। इस सत्र में अंजनी रायपत, बिस्वदीप चक्रवर्ती, चांदनी चौधरी, जेनेट डीनिफ़, गोविंद डीसी, हन्ना कर्टिस, जीसस रूइज़ मंतिल्ला, मस्तुरा मुहम्मद, जूली फिंच, लॉरा मैनरिंग, लाविनिया फ़्रे और शुभा संजय उर्स ने वैश्विक मंच पर सांस्कृतिक उत्सवों के आयोजन की जमीनी हकीकत साझा की। चर्चा में इस बात को स्वीकारा गया कि आज के दौर में एक साहित्यिक उत्सव चलाना केवल कला का काम नहीं, बल्कि राजनीति, प्रयोजकों की अपेक्षाओं और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने की एक कठिन चुनौती है। जयपुर बुकमार्क 2026 के इस समापन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि यह मंच केवल किताबों की खरीद-बिक्री का स्थान नहीं है, बल्कि यह वह बौद्धिक सेतु है जो वैश्विक प्रकाशन समुदाय को साझा जिम्मेदारी और सांस्कृतिक सहयोग की ओर ले जाता है।

Pratahkal Newsroom

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