Arctic natural resources Greenland : बर्फ से ढका ग्रीनलैंड दुनिया के सबसे शांत और दूर-दराज़ इलाकों में से एक माना जाता है, लेकिन उसके नीचे छुपी रणनीतिक ताकत आज वैश्विक राजनीति की नई जंग का केंद्र बन चुकी है। अमेरिका की नजरें दशकों से इस आर्कटिक क्षेत्र पर टिकी हुई हैं, और अब जब यह देश खुले तौर पर ग्रीनलैंड को अपने हितों से जोड़कर देख रहा है, तो यूरोप के भीतर राजनीतिक गठजोड़ और सामरिक संतुलन पर नया तनाव पैदा हो गया है।

इस विवाद की जड़ डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड में है, जिसकी भू-राजनीतिक अहमियत अब फिर से उभर कर सामने आ रही है। सवाल यह है कि यूरोप के कौन से देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे और कौन डेनमार्क के साथ मजबूती से अपने रुख पर अड़े रहेंगे।

ग्रीनलैंड विवाद की जड़: क्यों बढ़ रहा है तनाव ?

ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका के पास है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। इतिहास में 19वीं सदी से ही अमेरिका की इस द्वीप पर निगाह रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने यहां सैन्य मौजूदगी बनाई और बाद में भी आर्कटिक सुरक्षा के नाम पर अपनी भूमिका बनाए रखी।

हाल के वर्षों में आर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग और प्राकृतिक संसाधनों की संभावनाएँ बढ़ी हैं, जिससे ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। इस क्षेत्र में रूसी और चीनी गतिविधियों को देखते हुए अमेरिका की दखलअंदाजी को सुरक्षा की दृष्टि से समझा जा रहा है।

अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड की अहमियत :

ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए केवल भू-भाग नहीं, बल्कि रणनीतिक लोकेशन है। यहां अमेरिकी एयरबेस और रडार सिस्टम आर्कटिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसके अलावा दुर्लभ खनिज, तेल और गैस की संभावनाएं भी अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ाती हैं। यही कारण है कि अमेरिका इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता।

डेनमार्क का सख्त रुख :

डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच ऐतिहासिक और संवैधानिक संबंध हैं, और यूरोपीय यूनियन के कई देश इसे यूरोपीय संप्रभुता का सवाल मानते हैं। इन देशों की प्राथमिक चिंता यह है कि अमेरिका किसी यूरोपीय क्षेत्र पर दबाव न बनाए।

यूरोप में अमेरिका का साथ कौन दे सकता है ?

यूरोप में डेनमार्क के खिलाफ खुला विरोध कोई देश नहीं करता, लेकिन कुछ देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं अमेरिका के करीब दिखती हैं:

  • यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) : यूके की प्राथमिकता हमेशा से US-UK स्पेशल रिलेशनशिप रही है। आर्कटिक सुरक्षा, NATO और रूस विरोधी रणनीति में ब्रिटेन अक्सर अमेरिका के साथ खड़ा रहता है। हालांकि ब्रिटेन डेनमार्क के खिलाफ नहीं जाएगा, लेकिन कूटनीतिक तौर पर अमेरिका का समर्थन कर सकता है।
  • पोलैंड और बाल्टिक देश (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया) : इन देशों का मुख्य भय रूस है और अमेरिका को सुरक्षा गारंटर मानते हैं। यदि मामला NATO और आर्कटिक सुरक्षा से जुड़ा हो, तो ये देश अमेरिका के पक्ष में खड़े दिख सकते हैं।
  • नॉर्वे : नॉर्वे खुद आर्कटिक देश है और अमेरिका के साथ उसकी सैन्य साझेदारी मजबूत है। हालांकि वह सीधे डेनमार्क के खिलाफ नहीं जाएगा, लेकिन आर्कटिक में अमेरिकी मौजूदगी बढ़ाने के विचार का विरोध भी नहीं करता।
  • पूर्वी यूरोपीय देश (रोमानिया, चेक, स्लोवाकिया) : ये देश अक्सर यूरोपीय यूनियन की तुलना में अमेरिका की सुरक्षा नीति को प्राथमिकता देते हैं। ग्रीनलैंड पर वे खुला बयान न दें, लेकिन पर्दे के पीछे अमेरिका का समर्थन कर सकते हैं।

यूरोप में कौन-कौन से देश एक-दूसरे के दुश्मन हैं ?

ग्रीनलैंड विवाद के बीच यूरोप की पुरानी और जटिल दुश्मनियाँ भी सामने आती हैं:

  • रूस और पूर्वी यूरोप (पोलैंड, यूक्रेन, बाल्टिक देश) : सोवियत प्रभाव के बाद से इन देशों का रूस पर भरोसा कम है, और वे अमेरिका और NATO को सुरक्षा की गारंटी मानते हैं।
  • ग्रीस और तुर्की : एजियन सागर, साइप्रस और हवाई सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना रहता है।
  • सर्बिया और कोसोवो : सर्बिया कोसोवो को अपना हिस्सा मानता है, जबकि कोसोवो स्वतंत्रता का दावा करता है। इस मुद्दे पर यूरोप बंटा हुआ है, और रूस सर्बिया के करीब है।
  • फ्रांस और जर्मनी : दोनों विश्व युद्धों में विरोधी रहे, लेकिन अब यूरोप की रीढ़ माने जाते हैं। फिर भी आर्थिक नीतियों और यूरोपीय नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आते रहते हैं।
  • ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन : ब्रेक्जिट के बाद व्यापार, आव्रजन और कानूनों को लेकर तनाव बना है, और ब्रिटेन कई मामलों में यूरोप से अलग राह चुनता दिखता है।
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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