नई दिल्ली। अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बीच भारत की नजरें अमेरिका की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और मध्यपूर्व में गहराते तनाव पर टिकी हैं। नई दिल्ली पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रही है। भारत की चिंता केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति कमजोर होने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके अप्रत्याशित फैसले भी नई मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। आशंका है कि यदि मध्यपूर्व के हालात नहीं बदले और ट्रंप ने कोई ऐसा कदम उठाया, जिससे तनाव और बढ़ा, तो इसका सीधा असर भारत के हितों पर पड़ सकता है।

मध्यपूर्व में संघर्ष दोबारा तेज होने की स्थिति में वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर खतरा मंडरा सकता है। इसके अलावा ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के कारण ईंधन की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। भारत ने अपने ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाई है। इसके चलते अब देश के कुल तेल आयात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है, जबकि पहले यह आंकड़ा 50 से 70 प्रतिशत के बीच हुआ करता था। नई दिल्ली को इस बात का पूरा एहसास है कि संघर्ष के और गंभीर होने पर इसके कितने व्यापक परिणाम सामने आ सकते हैं।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सितंबर में ही चेतावनी दी थी कि यूक्रेन में जारी युद्ध और ईरान से जुड़े संघर्षों के कारण भविष्य में खाद्य एवं ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। इन संघर्षों के चलते अनाज, खाद, तेल और गैस की ढुलाई करने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है।

इसका असर ब्लैक सी यानी काला सागर से लेकर होर्मुज, फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर और अदन की खाड़ी तक दिखाई दे रहा है। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों में लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) भारतीय रहते और काम करते हैं। यह संख्या मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत के सामने मौजूद सुरक्षा जोखिमों की गंभीरता को दर्शाती है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि मंगलवार को ओमान के तट के पास भारतीय झंडे वाले एक वाणिज्यिक जहाज पर हमला हुआ, जिसमें एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई। इसके साथ ही ईरान से जुड़े संघर्षों में जान गंवाने वाले भारतीय नाविकों की कुल संख्या 15 हो गई है। मंत्रालय के बयान के मुताबिक, सोमवार को हुई इस घटना के बाद ओमान के कोस्ट गार्ड ने 13 भारतीयों को सुरक्षित बचा लिया।

मध्यपूर्व में तनाव और बढ़ने की आशंका पर रणधीर जायसवाल ने कहा, "हम लगातार सभी पक्षों से बातचीत और कूटनीति (डिप्लोमेसी) अपनाने की अपील कर रहे हैं, ताकि इस इलाके में शांति और स्थिरता वापस आ सके। इस संघर्ष में पहले ही बहुत से लोगों की जान जा चुकी है और इसने न केवल इस इलाके में, बल्कि पूरी दुनिया में लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।"

उन्होंने आगे कहा, "इसका वैश्विक स्तर पर भोजन, ईंधन, खाद और वित्तीय प्रवाह पर बहुत बुरा असर पड़ा है। हम चाहते हैं कि यह लड़ाई-झगड़ा तुरंत रुके, ताकि इस इलाके में हालात फिर से सामान्य हो सकें।"

हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि मध्यावधि चुनावों के बाद राजनीतिक रूप से कमजोर हुए ट्रंप क्या ईरान से जुड़े संघर्ष को समाप्त करा पाएंगे और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिरता बहाल कर सकेंगे?

ट्रंप का अप्रत्याशित व्यवहार

डोनाल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित और अस्थिर शासन शैली ने अमेरिका की आगे की रणनीति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। अमेरिकी कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्षी दल ट्रंप के फैसलों पर अंकुश लगा पाएंगे?

ट्रंप पहले भी यह दिखा चुके हैं कि उनकी नीतियां कांग्रेस की सोच से अलग हो सकती हैं, भले ही उस समय कांग्रेस पर रिपब्लिकन्स का नियंत्रण रहा हो। उनके सामने जब भी कोई राजनीतिक या नीतिगत बाधा आई, उन्होंने उससे निकलने का कोई न कोई वैकल्पिक रास्ता तलाश लिया। अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से डेमोक्रेट्स को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे उनके साथ मिलकर काम करें, अन्यथा उन्हें वीटो का सहारा लेना पड़ेगा।

रूस और रूसी तेल खरीदने वालों पर प्रतिबंध लगाने के लिए लिंडसे ओ. ग्राहम का सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट दोनों प्रमुख दलों, रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स, के समर्थन से जुड़ा था। इसके बावजूद चुनावों से ठीक पहले तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए ट्रंप ने रूस से लाखों टन डीजल आयात करने का समझौता कर लिया। उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों ने भी इस समझौते की आलोचना की, क्योंकि उस समय मॉस्को को बातचीत की मेज पर लाने के लिए उसके तेल राजस्व को निशाना बनाने की कोशिशें जारी थीं।

इसी तरह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी टैरिफ नीति खारिज किए जाने के बाद ट्रंप ने एक अलग रास्ता अपनाते हुए टैरिफ लागू करने का विकल्प निकाल लिया। कांग्रेस में रिपब्लिकन्स की पकड़ कमजोर होने के बावजूद राष्ट्रपति के पास अपनी कार्यकारी शक्तियां बनी रहती हैं। हालांकि, सैन्य अभियानों के लिए धनराशि रोकने का अधिकार कांग्रेस के पास हो सकता है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि रिपब्लिकन्स की हार के बाद ट्रंप के अधिकारों पर कुछ अंकुश लग सकता है। अब तक उन्हें मिली अपेक्षाकृत बेरोकटोक शक्तियों के इस्तेमाल में राजनीतिक बाधाएं बढ़ सकती हैं।

सऊदी अरब में भारत के पूर्व राजदूत और पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ तलमीज अहमद ने कहा, "यह कहना बहुत मुश्किल है कि आगे क्या होगा। अगर कांग्रेस पर उनका नियंत्रण नहीं रहता है, तो उनके लिए अपनी मनमानी (एकतरफा) नीति को जारी रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। उन पर काफी पाबंदियां लग जाएंगी। एक बात बिल्कुल साफ है कि पश्चिम एशिया में युद्ध छेड़ने से चुनावों में कोई फायदा नहीं मिलने वाला। आपको एक राजनेता की तरह, गंभीरता के साथ काम करना होगा, कूटनीति के जरिए सोचना होगा और अलग-अलग तरह के लोगों के साथ जुड़ना होगा। ट्रंप अपनी शर्तों पर होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने में सफल नहीं हो सके, इसलिए उन्होंने (केशम द्वीप पर) हमला कर दिया। उनके द्वारा किया गया यह दिखावटी हमला किसी काम का नहीं रहा।"

आगे क्या होगा?

अमेरिका की ओर से सीमित हमला किए जाने के बावजूद ईरान के साथ बातचीत जारी है। लेकिन मौजूदा हालात में आगे की दिशा को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इनमें ईरान के खिलाफ जमीनी हमले की संभावना से लेकर हमलों की नई लहर शुरू होने तक के कयास शामिल हैं।

मंगलवार को ट्रंप ने कहा कि तेहरान के साथ शांति समझौता "हो सकता है"। उन्होंने यह भी दावा किया कि तेहरान खुद समझौता करना चाहता है। दूसरी ओर, सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर एक पोस्ट में रूढ़िवादी टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने दावा किया कि आने वाले दिनों में ट्रंप यह फैसला करेंगे कि पिकएक्स माउंटेन स्थित परमाणु स्थल पर परमाणु हमला किया जाए या नहीं।

टकर कार्लसन ने यह भी कहा कि नेतन्याहू, जो हालिया चुनावों में बहुमत नहीं मिलने के बाद अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, मध्यावधि चुनाव समाप्त होने के बाद ईरान पर नए सिरे से हमले चाहते हैं। उन्होंने अपनी ट्विटर पोस्ट में लिखा, "मध्य पूर्व में अमेरिका के बाकी पुराने सहयोगी और भी युद्ध होने की संभावना से बुरी तरह डरे हुए हैं।"

तनाव के इस माहौल में ईरान का नेतृत्व भी लगातार कड़े जवाब की चेतावनी दे रहा है। ईरान की तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार, संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर घालीबाफ ने कहा है कि वे "ट्रिगर पर उंगली रखे" तैयार हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि वाशिंगटन ने कोई कदम उठाया, तो दुश्मनी की एक नई लहर शुरू हो सकती है।

इससे पहले ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया था कि देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मुजतबा खमेनेई ने सैन्य कमांडरों को किसी भी संभावित खतरे का जवाब देने के लिए तैयार रहने को कहा है। उन्होंने अमेरिका और इजराइल की संपत्तियों की एक अद्यतन सूची भी मांगी है। साथ ही निर्देश दिया है कि नया खतरा सामने आने पर तत्काल सशस्त्र जवाबी कार्रवाई की जाए।

इस पूरे घटनाक्रम में इजराइल की भूमिका भी अहम बनी हुई है। एसोसिएटेड प्रेस ने अमेरिका के कुछ अज्ञात अधिकारियों के हवाले से बताया है कि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पूर्ण पैमाने पर युद्ध की स्थिति में लौटना चाहते हैं। माना जा रहा है कि इससे उन्हें आपातकालीन सरकार बनाने में मदद मिल सकती है, क्योंकि हाल ही में इजराइल में हुए चुनावों में उनकी पार्टी संसद में बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी।

अमेरिका की आंतरिक राजनीति, ट्रंप के फैसलों, ईरान की जवाबी चेतावनियों और इजराइल की रणनीति के बीच मध्यपूर्व का संकट एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्थिरता का असर वहां रह रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा के साथ-साथ देश की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है।

Pratahkal Bureau

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