UK PM Keir Starmer resignation 2026 : ब्रिटिश राजनीति के सबसे शक्तिशाली गलियारे 10 डाउनिंग स्ट्रीट से एक ऐसी खबर आई है जिसने दुनिया भर के कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जुलाई 2024 में ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता की कमान संभालने वाले लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने महज दो साल के भीतर अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी है। बेहद भावुक और भारी मन से देश को संबोधित करते हुए स्टार्मर ने स्वीकार किया कि उनकी अपनी ही संसदीय पार्टी और कैबिनेट सहयोगियों को अब उनके नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा। ब्रिटिश राजनीति का यह अभूतपूर्व घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब देश आर्थिक मंदी, आंतरिक असंतोष और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भू-राजनीतिक दबावों से जूझ रहा है। इस महा-इस्तीफे ने न केवल ब्रिटेन के भीतर सत्ता के नए संघर्ष को जन्म दे दिया है, बल्कि भारत के साथ चल रहे ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और रणनीतिक संबंधों के भविष्य पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

संसद के गलियारों में महीनों से सुलग रही बगावत की चिंगारी आखिरकार उस समय दावानल में बदल गई, जब हाल ही में संपन्न हुए मेकरफील्ड उपचुनाव में स्टार्मर के धुर राजनीतिक प्रतिद्वंदी और ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व लोकप्रिय मेयर एंडी बर्नहैम ने प्रचंड जीत के साथ वेस्टमिंस्टर में वापसी की। बर्नहैम की इस धमक ने लेबर पार्टी के भीतर असंतुष्ट धड़े को एक नया और मजबूत चेहरा दे दिया, जिसके बाद कैबिनेट मंत्रियों सहित आधे से अधिक सांसदों ने स्टार्मर को स्पष्ट अल्टीमेटम दे दिया। स्टार्मर की विदाई की पटकथा वैसे तो मई 2026 के स्थानीय और क्षेत्रीय चुनावों में ही लिख दी गई थी, जहां लेबर पार्टी को अपनी करीब 1,000 काउंसिल सीटें गंवानी पड़ी थीं और वेल्स जैसे अपने अभेद्य गढ़ से भी हाथ धोना पड़ा था। जनता के इस तीखे आक्रोश के पीछे स्टार्मर सरकार की वे नीतियां थीं जिन्हें 'यू-टर्न का पुलिंदा' कहा जाने लगा था। पेंशनभोगियों के शीतकालीन ईंधन भत्ते में कटौती से लेकर कॉर्पोरेट टैक्स और अप्रवासन पर बार-बार बदलते बयानों ने उनकी छवि को एक कमजोर और दिशाहीन नेता के रूप में स्थापित कर दिया था, जिससे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ इतिहास के सबसे निचले स्तर माइनस 66 प्रतिशत तक गिर गया था।

घरेलू मोर्चे पर रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और अवैध प्रवासियों की आमद को रोकने में विफलता के साथ-साथ स्टार्मर की विदेश नीति ने भी आग में घी का काम किया। यूक्रेन संकट और विशेषकर ईरान युद्ध में ब्रिटेन की भागीदारी को लेकर उनके अनिर्णायक रुख ने जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाशिंगटन और विशेषकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंधों में कड़वाहट पैदा की, वहीं देश के भीतर भी उनके खिलाफ नाराजगी बढ़ाई। सरकार की साख पर आखिरी और सबसे गहरा बट्टा तब लगा जब अमेरिकी राजदूत के रूप में पीटर मैंडेलसन की विवादित नियुक्ति हुई, जिनका नाम कुख्यात एपस्टीन स्कैंडल से जुड़ा हुआ था। मैंडेलसन की गिरफ्तारी और मुख्य रणनीतिकारों के लगातार होते इस्तीफों ने स्टार्मर को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया। अपने विदाई भाषण में स्टार्मर ने रूंधे गले से कहा कि उन्होंने हमेशा देशहित को आगे रखा, लेकिन अब वह यह पद छोड़कर अपनी पत्नी विक्टोरिया और बच्चों को समय देना चाहते हैं।

इस राजनीतिक भूचाल का सीधा असर नई दिल्ली और लंदन के बीच के कूटनीतिक सेतु पर पड़ना तय माना जा रहा है। कीर स्टार्मर का दो साल का कार्यकाल इस मायने में ऐतिहासिक था कि उन्होंने लेबर पार्टी की पारंपरिक 'भारत-विरोधी' और कश्मीर मुद्दे पर दखल देने वाली छवि को पूरी तरह से बदलने का काम किया था। उन्होंने दोटूक शब्दों में कश्मीर को भारत का आंतरिक और द्विपक्षीय मामला मानकर नई दिल्ली के साथ रक्षा, सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक परिपक्व रणनीतिक साझेदारी की नींव रखी थी। हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान ऋषि सुनक के समय से लंबित भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अपनी अंतिम परिणति तक नहीं पहुंच सका। भारत जहां अपने आईटी पेशेवरों और डॉक्टरों के लिए आसान वीजा नियमों की मांग कर रहा था, वहीं स्टार्मर सरकार ब्रिटेन के भीतर प्रवासियों के खिलाफ भड़के गुस्से और नेट माइग्रेशन को कम करने के भारी दबाव के कारण बैकफुट पर थी। इसके परिणामस्वरूप छात्र वीजा और वर्क वीजा के नियमों को सख्त किया गया, जिसने ब्रिटेन जाने वाले हजारों भारतीय छात्रों और पेशेवरों के सपनों को प्रभावित किया।

कीर स्टार्मर आगामी सितंबर 2026 तक, यानी लेबर पार्टी द्वारा नया नेता चुने जाने तक, कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे। ब्रिटिश चांसलर और बाजार के जानकारों के अनुसार, इस राजनीतिक अस्थिरता के कारण ब्रिटिश पाउंड पर दबाव बढ़ गया है और वह पिछले तीन महीनों के निचले स्तर पर आ गया है। इस समय एंडी बर्नहैम प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ब्रिटेन में पिछले दस वर्षों में सातवें प्रधानमंत्री की यह दस्तक कूटनीतिक निरंतरता के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारत के दृष्टिकोण से, सत्ता के इस फेरबदल के कारण मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की रफ्तार कुछ महीनों के लिए धीमी पड़ सकती है, क्योंकि नई लीडरशिप को अपनी प्राथमिकताओं को तय करने में समय लगेगा। फिर भी, दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और हिंद-प्रशांत सुरक्षा से जुड़े बुनियादी हित इतने गहरे हैं कि कूटनीतिक गलियारों में इस बात की पूरी उम्मीद है कि दीर्घकालिक संबंधों की इस मजबूत इमारत पर लंदन की इस राजनीतिक उथल-पुथल का कोई स्थाई और नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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