‘तुफ़ात अल-मुमिनात’ ऑनलाइन कोर्स ; जैश-ए-मोहम्मद का चुनौतीपूर्ण अभियान
पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने महिलाओं के लिए "तुफ़ात अल-मुमिनात" नामक ऑनलाइन कोर्स शुरू किया है। जो सुरक्षा चुनौतियों और संवेदनशीलता के बीच एक बढ़ता खतरा प्रस्तुत करता है।

मसूद अज़हर
पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) ने हाल ही में "तुफ़ात अल-मुमिनात" नामक एक ऑनलाइन कोर्स शुरू किया है, जिसके ज़रिए महिलाओं को इस्लामी "जिहाद" के सिद्धांत सिखाने के नाम पर संगठन से जोड़ा जा रहा है। यह कार्यक्रम 8 नवंबर से आरंभ होगा और इसका संचालन मसूद अजहर की बहनें सादिया और समायरा अजहर करेंगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, महिलाओं की भर्ती और फंड जुटाने के लिए यह कदम आतंकी नेटवर्क की नई रणनीति है ।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह ऑनलाइन कोर्स न केवल महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश है, बल्कि फंड जुटाने का नया तरीका भी है। पहले जैश युवाओं को प्रशिक्षण शिविरों में भर्ती करता था, लेकिन अब डिजिटल माध्यमों के जरिए महिलाओं को भी शामिल करने का प्रयास कर रहा है।
कानूनी दृष्टिकोण:
वैश्विक आतंकवाद कानूनों का उल्लंघन:
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद, इस तरह के ऑनलाइन कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के रिज़ोल्यूशन 1373 और रिज़ोल्यूशन 2178 का सीधा उल्लंघन हैं। इन प्रस्तावों के तहत सदस्य देशों को आतंकी संगठनों की भर्ती, प्रशिक्षण या प्रचार गतिविधियों को रोकने की जिम्मेदारी दी गई है।
भारत के कानूनों के तहत अपराध:
भारत में यह एक्टिविटी "गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967" और "आईटी एक्ट, 2000" के तहत दंडनीय अपराध है। UAPA की धारा 13 और 18 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति या समूह द्वारा ऑनलाइन माध्यम से आतंकी संगठन की सदस्यता लेना या भर्ती अभियान चलाना आतंकवादी गतिविधि मानी जाएगी, भले ही वह भारत की सीमाओं के बाहर क्यों न हो।
FATF और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही:
पाकिस्तान पहले ही Financial Action Task Force (FATF) की निगरानी सूची में रह चुका है। जैश-ए-मोहम्मद द्वारा डिजिटल रूप से फंड जुटाने की गतिविधियां FATF के वित्तीय निगरानी नियमों का उल्लंघन करती हैं। यदि यह साबित होता है कि इस अभियान को पाकिस्तान की भूमि से सपोर्ट मिला, तो इस पर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कार्रवाई संभव है।
आतंकवाद-निरोधक दृष्टिकोण:
महिलाओं की भर्ती-नई रणनीति:
जैश द्वारा महिलाओं को निशाना बनाना पारंपरिक आतंकवाद-विरोधी ढांचे के लिए नई चुनौती है। महिलाएं अब तक प्रचार, आर्थिक सहयोग या समर्थन भूमिकाओं में रही थीं, लेकिन अब उन्हें "सीधे जिहाद" में शामिल करने की रणनीति एक मानसिक और सामाजिक खतरा पेश करती है।
ऑनलाइन कट्टरपंथ की वैश्विक चुनौती:
यह अभियान दिखाता है कि आतंकवाद अब मैदानों से निकलकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पहुँच चुका है। ऐसे ऑनलाइन कोर्स एन्क्रिप्टेड ऐप्स, निजी सोशल नेटवर्क्स और शिक्षा के मुखौटे के पीछे छिपाए जाते हैं। इनसे मुकाबले के लिए भारत और अन्य देशों को साइबर-इंटेलिजेंस सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता होगी।
साझा खुफिया समन्वय की जरूरत:
भारत की एजेंसियों- NIA, RAW और IB - ने इस पर कड़ी नजर रखी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे रोकने के लिए "साइबर काउंटर-टेरर प्रोटोकॉल" की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यकता है, ताकि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इस तरह की गतिविधियाँ स्वतः रिपोर्टेड और ब्लॉक की जा सकें।
भारत के प्रति हाइब्रिड खतरे की आशंका:
यह कार्यक्रम संभवतः सीमापार से भारत में आतंकी प्रचार सामग्री फैलाने का माध्यम बन सकता है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार, इसे "साइलेंट रेडिकलाइजेशन नेटवर्क" माना जा रहा है, जिसमें महिला उपयोगकर्ताओं को "धर्म रक्षा" के नाम पर जोड़ा जाता है और धीरे-धीरे उन्हें संगठन के दायरे में लाया जाता है ।
"तुफ़ात अल-मुमिनात" सिर्फ ऑनलाइन कोर्स नहीं, बल्कि जैश-ए-मोहम्मद की वह रणनीति है, जिसके जरिए वह वैश्विक प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए डिजिटल भर्ती और फंडिंग के नए रास्ते तलाश रहा है। यह मामला आतंकवाद की पारंपरिक परिभाषा को चुनौती देता है और यह संकेत देता है कि "आतंक का अगला मोर्चा-डिजिटल और वैचारिक होगा।"

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
