Trump Greenland takeover : आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में आ गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया रुख को देखते हुए यह संकेत मिल रहे हैं कि वह ग्रीनलैंड को लेकर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। दूसरी ओर, डेनमार्क और उसके सहयोगी देश ग्रीनलैंड की संप्रभुता बचाने के लिए कूटनीतिक और सैन्य विकल्प तलाश रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर ट्रंप ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का फैसला कर लेते हैं, तो क्या NATO और डेनमार्क के पास उसे रोकने की वास्तविक क्षमता है।

क्यों ग्रीनलैंड बना वैश्विक शक्तियों का केंद्र :

ग्रीनलैंड भले ही प्रशासनिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा हो, लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत दुनिया की तमाम महाशक्तियों को आकर्षित करती है। इस द्वीप में सोना, दुर्लभ खनिज, तेल और रेयर अर्थ मटेरियल जैसे संसाधनों की मौजूदगी मानी जाती है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ के पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जिससे एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी कम हो सकती है। इन मार्गों पर नियंत्रण भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

ग्रीनलैंड और डेनमार्क का रुख :

ग्रीनलैंड की आबादी मात्र लगभग 56 हजार है, लेकिन उसका भविष्य अंतरराष्ट्रीय राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है। डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। NATO के अन्य सदस्य देशों ने भी इसी रुख का समर्थन किया है। इसी के जवाब में डोनाल्ड ट्रंप ने NATO देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है और समझौता न होने की स्थिति में 1 फरवरी से 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है।

फ्रांस का पलटवार और ‘एंटी-कोअर्सन इंस्ट्रूमेंट’ :

NATO की ओर से सबसे तीखा राजनीतिक जवाब फ्रांस ने दिया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने यूरोपीय यूनियन से ‘एंटी-कोअर्सन इंस्ट्रूमेंट’ को सक्रिय करने की मांग की है। इस व्यवस्था को व्यापारिक दुनिया में एक शक्तिशाली हथियार माना जाता है, जिसके तहत यूरोपीय संघ अमेरिका से आयात रोक सकता है या अतिरिक्त टैक्स लगा सकता है। इसे ट्रंप के टैरिफ दबाव के खिलाफ संभावित जवाबी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।

सैन्य मोर्चे पर NATO की तैयारी :

NATO ने सैन्य स्तर पर ‘आर्कटिक एड्योरेंस’ नामक अभ्यास शुरू किया है, जिसके तहत फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नॉर्वे, नीदरलैंड्स, फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क के सैनिक ग्रीनलैंड पहुंचे हैं। हालांकि, इस अभ्यास में शामिल सैनिकों की संख्या बेहद सीमित है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह अभ्यास प्रतीकात्मक एकजुटता तो दिखाता है, लेकिन अमेरिका जैसी सैन्य शक्ति के सामने इसे निर्णायक नहीं माना जा सकता। NATO भविष्य में ‘ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री’ के तहत बड़ा अभ्यास करने की योजना बना रहा है, हालांकि इसकी समय-सीमा और दायरा अभी स्पष्ट नहीं है।

NATO की असली चुनौती :

विश्लेषकों के अनुसार, NATO की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि उसकी सैन्य, तकनीकी और लॉजिस्टिक क्षमताओं का बड़ा हिस्सा अमेरिका पर निर्भर है। हथियारों की आपूर्ति, सैटेलाइट इंटेलिजेंस, मिसाइल डिफेंस, ऊर्जा संसाधन और यहां तक कि क्लाउड व सेमिकंडक्टर टेक्नोलॉजी में भी यूरोपीय देश अमेरिका पर निर्भर हैं। ऐसे में NATO के लिए अमेरिका के खिलाफ निर्णायक कदम उठाना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है।

ग्रीनलैंड का भविष्य और वैश्विक जोखिम :

वर्तमान हालात में यह साफ दिखता है कि NATO और डेनमार्क के पास कूटनीतिक और सीमित सैन्य विकल्प तो हैं, लेकिन अमेरिका को सीधे टकराव में चुनौती देना आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस विवाद में रूस या चीन की एंट्री होती है, तो यह सिर्फ ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। ऐसे परिदृश्य में दुनिया एक ऐसे संघर्ष की ओर बढ़ सकती है, जिसकी व्यापकता और विनाश की कल्पना करना भी कठिन है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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