सऊदी अरब ने अपनी धरती और हवाई क्षेत्र के उपयोग पर पाबंदी लगाई; ईरान के साथ जारी शांति प्रयासों का दिया हवाला।

पश्चिम एशिया के सामरिक गलियारों में चल रही भारी हलचल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' पर अचानक विराम लग गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की नाकेबंदी को तोड़ने के उद्देश्य से घोषित इस महत्वाकांक्षी सैन्य अभियान को शुरू होने के मात्र 36 घंटे के भीतर वापस लेना पड़ा। इस अप्रत्याशित यू-टर्न के पीछे खाड़ी में अमेरिका के सबसे विश्वसनीय और महत्वपूर्ण सहयोगी, सऊदी अरब की कड़ी नाराजगी और असहयोग को मुख्य कारण बताया जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन के उच्चाधिकारियों के अनुसार, रियाद ने अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता का हवाला देते हुए अमेरिकी सेना को अपनी धरती और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब वाशिंगटन ने वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए एकतरफा सैन्य पहल की घोषणा की। हालांकि, इस घोषणा ने खाड़ी के देशों, विशेषकर सऊदी अरब को चौंका दिया। एनबीसी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने अमेरिका को दो टूक शब्दों में बता दिया कि वह प्रिंस सुल्तान एयरबेस से किसी भी प्रकार के लड़ाकू विमान उड़ाने की अनुमति नहीं देगा। गौरतलब है कि यह वही बेस है जिसे ईरान ने हालिया संघर्ष के दौरान निशाना बनाया था। रियाद का यह रुख केवल सैन्य अड्डों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने अमेरिकी विमानों के लिए अपने हवाई क्षेत्र के उपयोग पर भी पाबंदी लगा दी, जिससे ईरान के खिलाफ किसी भी प्रभावी कार्रवाई की संभावना क्षीण हो गई।

सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब का यह निर्णय क्षेत्र में बदलती कूटनीति का संकेत है। वर्तमान में पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए गहन राजनयिक प्रयास जारी हैं, और सऊदी अरब इन शांति प्रयासों का सक्रिय समर्थन कर रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में अमेरिका द्वारा किसी भी सैन्य अभियान की घोषणा को रियाद ने इन प्रयासों में बाधा माना। राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ व्यक्तिगत रूप से संवाद करके बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया, लेकिन रियाद ने अपनी सैन्य सीमाओं पर समझौता करने से इनकार कर दिया।

केवल सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि ओमान और कतर जैसे क्षेत्रीय साझेदारों ने भी अमेरिका के इस एकतरफा कदम पर हैरानी जताई है। ओमान के एक राजनयिक ने खुलासा किया कि वाशिंगटन ने 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' की घोषणा से पहले मस्कट के साथ कोई पूर्व तालमेल नहीं किया था, जिससे क्षेत्रीय सहयोग की कमी उजागर हुई। यद्यपि व्हाइट हाउस का दावा है कि सहयोगियों को पहले ही सूचित कर दिया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आती है। अभियान के स्थगित होने से पहले केवल दो अमेरिकी विध्वंसक होर्मुज को पार करने में सफल रहे, जिन पर ईरानी हमलों की विफल कोशिशें भी की गईं। 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' का यह अचानक अंत ट्रंप प्रशासन की क्षेत्रीय कूटनीति और खाड़ी देशों के साथ उनके वर्तमान संबंधों की जटिलता को प्रदर्शित करता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story