ग्रीनलैंड पर छिड़ी 'जंग': क्यों इस बर्फीले द्वीप के पीछे पागल हैं दुनिया के अमीर देश? जानें छिपे खजाने का सच
ग्रीनलैंड को खरीदने के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। आखिर बर्फ से ढके इस द्वीप का नाम 'ग्रीनलैंड' क्यों पड़ा? जानें वाइकिंग योद्धा एरिक द रेड की वो मार्केटिंग स्ट्रैटेजी जिसने दुनिया को चौंकाया और क्यों अमेरिका के लिए यह रणनीतिक रूप से 'सोने की चिड़िया' है। पढ़ें एक हजार साल पुराने इतिहास से लेकर आधुनिक मिसाइल डिफेंस की पूरी कहानी।

Greenland Dispute : इन दिनों दुनिया के नक्शे पर जमे एक विशाल बर्फीले द्वीप 'ग्रीनलैंड' को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उबाल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस द्वीप को खरीदने की मंशा और वहां की जनता द्वारा किए जा रहे "ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है" के नारों ने एक पुराने कूटनीतिक विवाद को फिर से हवा दे दी है। लेकिन सवाल यह है कि जिस जमीन पर 80% से ज्यादा हिस्सा बर्फ की चादर से ढका है और जहां प्रकृति का हरा रंग दुर्लभ है, उसका नाम 'ग्रीनलैंड' क्यों पड़ा? इसके पीछे 10वीं सदी के एक चतुर वाइकिंग योद्धा की 'मार्केटिंग स्ट्रैटेजी' छिपी है।
इतिहास का सबसे बड़ा 'झूठ' या मास्टरस्ट्रोक ?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस कहानी का नायक है 'एरिक द रेड' (Erik the Red)। 10वीं सदी में जब इस वाइकिंग नाविक को आइसलैंड से निर्वासित किया गया, तो उसने पश्चिम में एक नई जमीन खोजी। वह द्वीप पूरी तरह सफेद बर्फ और कड़ाके की ठंड की चपेट में था। एरिक जानता था कि अगर उसने इस जगह का नाम 'आइसलैंड' जैसा ही कुछ रखा, तो कोई वहां बसने नहीं आएगा।
खुराफाती दिमाग: लोगों को आकर्षित करने के लिए एरिक ने इस सफेद द्वीप का नाम 'ग्रीनलैंड' (हरी-भरी जमीन) रख दिया।
नतीजा: इस जबरदस्त मार्केटिंग चाल के कारण लोग उस अनजान और ठंडी जगह पर बसने के लिए तैयार हो गए। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जिसका क्षेत्रफल जर्मनी से छह गुना बड़ा है, लेकिन आबादी मात्र 56 हजार के करीब है।
ट्रंप के लिए क्यों 'सोने की चिड़िया' है ग्रीनलैंड ?
अमेरिकी प्रशासन की इस द्वीप में दिलचस्पी केवल खनिज भंडार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक और सैन्य कारण हैं:
मिसाइल डिफेंस सिस्टम: आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड किसी भी मिसाइल हमले की पूर्व चेतावनी देने के लिए सबसे मुफीद जगह है। अमेरिका यहां द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही 'पिटुफिक स्पेस बेस' (पुराना नाम धुले एयर बेस) संचालित कर रहा है।
आर्कटिक रूट पर नजर: पिघलती बर्फ के बीच आर्कटिक से गुजरने वाले जहाजों और रूस-चीन की गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए यह द्वीप एक 'नेचुरल एयरक्राफ्ट कैरियर' की तरह काम करता है।
कोल्ड वॉर का इतिहास: शीत युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने यहां परमाणु मिसाइलें तैनात करने की कोशिश की थी, लेकिन डेनमार्क के कड़े विरोध के कारण वह सफल नहीं हो सका था।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
