Strait of Hormuz crisis 2026 : वैश्विक राजनीति के मंच पर युद्ध और कूटनीति के बीच एक ऐसा मोड़ आ गया है जिसने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के अस्थायी सीजफायर के बावजूद, सामरिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर अनिश्चितता के बादल गहराए हुए हैं। ईरान ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए इस रास्ते से गुजरने वाले कुछ विदेशी जहाजों से २० लाख डॉलर (करीब १८.५ करोड़ रुपये) प्रति जहाज की भारी-भरकम 'ट्रांजिट फीस' वसूलना शुरू कर दिया है। यह कदम न केवल अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों को चुनौती दे रहा है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है।

ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के वरिष्ठ सदस्य अलाएद्दीन बोरौजेर्दी ने इस वसूली की पुष्टि करते हुए इसे ईरान की संप्रभुता और शक्ति का परिचायक बताया है। गौरतलब है कि २८ फरवरी को ईरान पर हुए हमलों के बाद से यह रास्ता तेल और गैस के टैंकरों के लिए लगभग बंद हो गया था, जिससे वैश्विक बाजार में हाहाकार मच गया था। अब जबकि अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में शांति वार्ता की मेज सज रही है, तब होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर लगाया गया यह 'टोल' विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।

इस तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत की भूमिका और स्थिति पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए स्थिति स्पष्ट की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नौ अप्रैल को हुई प्रेस ब्रीफिंग में सीधे तौर पर कहा कि भारत को होर्मुज जलडमरूमध्य पर टोल लगाए जाने की खबरें मिली हैं, लेकिन भारत अपनी पुरानी नीति पर अडिग है। भारत का स्पष्ट मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से जहाजों का आवागमन पूरी तरह स्वतंत्र और सुरक्षित होना चाहिए। जायसवाल ने जोर देकर कहा कि भारत और ईरान के बीच इस तरह के किसी भी भुगतान या शुल्क को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है और भविष्य में यदि ऐसी कोई नौबत आती है, तो भारत उस समय अपनी रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेगा।

भारतीय कूटनीति के लिए राहत की बात यह है कि ईरान ने फिलहाल भारत को एक 'मित्र राष्ट्र' के रूप में देखते हुए बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के आवागमन की अनुमति दी है। हाल के दिनों में भारतीय ध्वज वाले आठ एलपीजी टैंकर इस रास्ते से सुरक्षित निकले हैं, जो भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों के लिए ९० फीसदी तक मध्य पूर्व पर निर्भर है, ऐसे में होर्मुज की सुरक्षा सीधे तौर पर भारत की रसोई और अर्थव्यवस्था से जुड़ी है। केंद्र सरकार ने उन तमाम अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि भारत ने अपने जहाजों को निकालने के लिए ईरान को कोई गुप्त भुगतान किया है।

अंततः, होर्मुज का यह संकट केवल दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार के भविष्य का सवाल है। यदि सीजफायर के बाद भी ईरान अपनी इस सख्त नीति पर कायम रहता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS) के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह एक तरफ ईरान के साथ अपनी पुरानी दोस्ती बरकरार रखे और दूसरी तरफ अमेरिका के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करे। आने वाले दिनों में पाकिस्तान में होने वाली वार्ता यह तय करेगी कि होर्मुज का यह रास्ता दुनिया के लिए 'व्यापार का मार्ग' बना रहेगा या 'वसूली का अड्डा' बन जाएगा।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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