Pakistan shia sunni sangharsh : पाकिस्तान में शिया और सुन्नी समुदायों के बीच लंबे समय से चल रहे संघर्ष की जड़ें गहरी और जटिल हैं। इस्लाम के दो मुख्य संप्रदाय—सुन्नी और शिया—के बीच धार्मिक और राजनीतिक मतभेद सदियों से मौजूद हैं। शिया मुसलमान मानते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के उत्तराधिकारी इमाम अली और उनकी वंशावली होने चाहिए, जबकि सुन्नी मुसलमान नेतृत्व को सामूहिक निर्णय या खलीफत के माध्यम से चुने जाने का पक्षधर हैं।

1947 में भारत से अलग होकर पाकिस्तान के निर्माण के समय यह बहुसंख्यक- अल्पसंख्यक समुदाय का संतुलन शांतिपूर्ण प्रतीत हुआ, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक असमानताओं ने समय के साथ तनाव को जन्म दिया। धार्मिक मतभेद, विशेष रूप से शिया समुदाय द्वारा अशूरा जैसे त्योहारों का भव्य आयोजन, और सुन्नी परंपराओं के बीच अंतर, विवाद का एक प्रमुख कारण बने। राजनीतिक और सामाजिक असमानताओं ने शिया अल्पसंख्यकों को अक्सर दबाव में रखा।

अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने भी इस संघर्ष को प्रभावित किया। 1979 की इरान की इस्लामिक क्रांति ने शिया मुसलमानों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई, वहीं सऊदी अरब और अमेरिका का सुन्नी आंदोलनों को समर्थन और इरान का शिया आंदोलनों का समर्थन, दोनों ही पक्षों के बीच तनाव को गहरा करता रहा।

पाकिस्तान में यह संघर्ष विशेष रूप से 1980 के दशक में स्पष्ट हुआ। जनरल जियाउल हक और जुल्फिकार भुट्टो के शासनकाल में सुन्नी-शिया विभाजन और इस्लामी कानूनों पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस दौरान सुन्नी कट्टरपंथी संगठन जैसे सिपाह-ए-साहिब और शिया रक्षा समूहों का गठन हुआ। 1990 के दशक में कराची, लाहौर और पेशावर जैसे शहरों में सामूहिक हिंसा और शिया मुसलमानों पर लक्षित हमले हुए। 2000 के बाद तालिबानी और अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के उदय के साथ हिंसा ने नई तेज़ी पकड़ी। शिया और सुन्नी मस्जिदों तथा धार्मिक आयोजनों पर हमले आम हो गए। अनुमान है कि पाकिस्तान में हर साल हजारों शिया मुसलमानों की हत्या होती रही।

हालिया वर्षों (2020-2025) में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में हमलों की घटनाएँ सामने आई हैं, जबकि सोशल मीडिया और धर्मनिरपेक्ष संगठनों के माध्यम से शांति और समानता की कोशिशें जारी हैं। सामाजिक पहलू में शिया मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, लगभग 15-20% आबादी, जबकि सुन्नी बहुसंख्यक हैं। शिक्षा और रोजगार में असमानता और धार्मिक आयोजनों में तनाव आम बात है। राजनीतिक रूप से सुन्नी दलों का प्रभुत्व रहा है, जबकि शिया राजनीतिक पार्टियाँ अक्सर दबाव में रही हैं।

आतंकवाद और सुरक्षा का मुद्दा भी संघर्ष का महत्वपूर्ण पहलू है। लश्कर-ए-जयसी, तहरीक-ए-तालिबान और सिपाह-ए-साहिब जैसे कट्टरपंथी संगठनों ने शिया समुदाय पर हमले किए। सरकारी सुरक्षा बलों की जवाबदेही और कमजोरियों ने इस संकट को और जटिल बना दिया।

वर्तमान में पाकिस्तान में शिया-सुन्नी संघर्ष की तीव्रता कम हुई है, लेकिन यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अधिकांश शिया मुसलमान सुरक्षित क्षेत्रों में रहते हैं, बावजूद इसके हमले और धमकियाँ अभी भी बनी हुई हैं। सरकार और एनजीओ शांति और सामाजिक सामंजस्य के लिए प्रयासरत हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक सहिष्णुता बढ़ाने, राजनीतिक समानता सुनिश्चित करने, कड़े कानून और सुरक्षा उपाय लागू करने तथा अंतरराष्ट्रीय दबाव और समर्थन के संतुलन से ही इस लंबे संघर्ष को स्थायी समाधान की दिशा में ले जाया जा सकता है।

इस संघर्ष का विश्लेषण यह दर्शाता है कि धार्मिक मतभेद, राजनीतिक असमानता, विदेशी हस्तक्षेप और आतंकवाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सामाजिक सामंजस्य के लिए आज भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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