1969 के स्टोनवॉल दंगों से शुरू हुआ LGBTQ+ प्राइड आंदोलन आज वैश्विक पहचान और समान अधिकारों का प्रतीक बन चुका है। जानिए प्राइड परेड का इतिहास, इसके पीछे का संघर्ष, “प्राइड” शब्द की उत्पत्ति, रेनबो फ्लैग का महत्व, शुरुआती गे लिबरेशन मार्च और भारत में 1999 के कोलकाता रेनबो प्राइड वॉक से शुरू हुई LGBTQ+ अधिकारों की यात्रा।

हर साल जून का महीना दुनिया भर में LGBTQ+ समुदाय के लिए पहचान, अधिकारों और सम्मान के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। रंग-बिरंगे झंडों, विशाल परेडों और सार्वजनिक आयोजनों के पीछे एक लंबा संघर्ष, सामाजिक अस्वीकार्यता के खिलाफ लड़ाई और समान अधिकारों की मांग का इतिहास छिपा है। आज जिस प्राइड परेड को लाखों लोग उत्सव के रूप में देखते हैं, उसकी शुरुआत दरअसल विरोध और प्रतिरोध की भावना से हुई थी।

प्राइड परेड, जिसे प्राइड इवेंट, प्राइड फेस्टिवल, प्राइड मार्च, प्राइड प्रोटेस्ट, इक्वैलिटी परेड या इक्वैलिटी मार्च के नाम से भी जाना जाता है, LGBTQ+ समुदाय और उनके समर्थकों द्वारा आयोजित एक ऐसा आयोजन है जिसमें समलैंगिक, उभयलिंगी, ट्रांसजेंडर और क्वीयर लोगों की पहचान, उपलब्धियों, कानूनी अधिकारों और आत्मसम्मान का उत्सव मनाया जाता है। कई देशों में ये आयोजन समान विवाह, भेदभाव विरोधी कानूनों और अन्य नागरिक अधिकारों की मांग के लिए सार्वजनिक प्रदर्शन का भी रूप लेते हैं।

प्राइड आंदोलन की पृष्ठभूमि 1960 और 1970 के दशक के अमेरिका में दिखाई देती है, जब नागरिक अधिकारों, युद्ध विरोधी आंदोलनों और LGBTQ+ अधिकारों के लिए सार्वजनिक प्रदर्शन तेज़ी से बढ़ रहे थे। वर्ष 1965 में मैटाचीन सोसाइटी और डॉटर्स ऑफ बिलिटिस द्वारा व्हाइट हाउस के बाहर आयोजित “होमोफाइल मार्च” को समलैंगिक और लेस्बियन अधिकारों के लिए शुरुआती प्रदर्शनों में गिना जाता है। इसका उद्देश्य संघीय रोजगार में भेदभाव को उजागर करना और LGBTQ+ समुदाय के लिए समानता की मांग करना था।

इसी वर्ष डॉटर्स ऑफ बिलिटिस और मैटाचीन सोसाइटी के सदस्यों ने “एनुअल रिमाइंडर” नामक विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया, जबकि मैटाचीन समूह ने क्यूबा के श्रम शिविरों में कैद समलैंगिकों के समर्थन में भी प्रदर्शन किए। इन शुरुआती आंदोलनों ने LGBTQ+ अधिकारों की आवाज़ को सार्वजनिक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि आधुनिक प्राइड आंदोलन का सबसे बड़ा मोड़ 28 जून 1969 को आया। न्यूयॉर्क सिटी के लोअर मैनहैटन स्थित ग्रीनविच विलेज इलाके में मौजूद स्टोनवॉल इन नामक एक लोकप्रिय गे बार पर पुलिस ने छापा मारा। उस समय LGBTQ+ समुदाय के लोगों को अक्सर पुलिस उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था। लेकिन इस बार स्थिति अलग थी। पुलिस कार्रवाई के खिलाफ LGBTQ+ समुदाय के लोगों ने विरोध किया और देखते ही देखते यह विरोध कई दिनों तक चलने वाले दंगों और प्रदर्शनों में बदल गया।

स्टोनवॉल इन विशेष रूप से उन लोगों के लिए एक सुरक्षित स्थान माना जाता था जो समाज में सबसे अधिक हाशिए पर थे, जिनमें ट्रांसवेस्टाइट, ट्रांसजेंडर व्यक्ति, स्त्रैण युवा पुरुष, सेक्स वर्कर और बेघर युवा शामिल थे। स्टोनवॉल दंगों ने LGBTQ+ अधिकार आंदोलन को नई दिशा दी और इसे आधुनिक LGBTQ+ सामाजिक आंदोलन की निर्णायक घटना माना जाता है।

स्टोनवॉल विद्रोह के बाद आंदोलन अधिक मुखर और उग्र हुआ। इसके परिणामस्वरूप 1970 में स्टोनवॉल की पहली वर्षगांठ पर न्यूयॉर्क सिटी, शिकागो, लॉस एंजिल्स और सैन फ्रांसिस्को में बड़े पैमाने पर प्राइड और विरोध मार्च आयोजित किए गए। इन आयोजनों को “गे लिबरेशन मार्च” और “गे फ्रीडम मार्च” कहा गया, जिनका उद्देश्य पूर्ण समानता और सामाजिक मुक्ति की मांग को सार्वजनिक रूप से उठाना था। यही मार्च आगे चलकर वार्षिक प्राइड परेड के रूप में विकसित हुए और धीरे-धीरे दुनिया भर में फैल गए।

“प्राइड” शब्द स्वयं उस सामाजिक शर्म और कलंक के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के रूप में उभरा, जिसका LGBTQ+ समुदाय लंबे समय से सामना कर रहा था। इसका संदेश स्पष्ट था कि किसी व्यक्ति को अपनी यौन पहचान या लैंगिक पहचान के कारण शर्मिंदा महसूस नहीं करना चाहिए। इसी विचार ने “गे प्राइड” के नारे को जन्म दिया, जो समय के साथ पूरे LGBTQ+ समुदाय का प्रतिनिधित्व करने लगा।

प्राइड आंदोलन की एक और महत्वपूर्ण पहचान इंद्रधनुषी झंडा है। वर्ष 1978 में कलाकार गिल्बर्ट बेकर ने पहली बार प्राइड फ्लैग तैयार किया। मूल रूप से इसमें आठ रंग शामिल थे, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलकर आज के प्रसिद्ध छह रंगों वाले रेनबो फ्लैग में विकसित हो गया। झंडे का प्रत्येक रंग जीवन, विविधता और समुदाय के अलग-अलग पहलुओं का प्रतीक माना जाता है।

समय के साथ प्राइड आयोजन अमेरिका की सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक स्तर पर फैल गए। आज दुनिया के अनेक देशों में हर वर्ष प्राइड परेड, सांस्कृतिक उत्सव, फिल्म समारोह, शैक्षणिक कार्यक्रम और सामाजिक जागरूकता अभियानों का आयोजन किया जाता है। कई स्थानों पर ये आयोजन अभी भी कानूनी और सामाजिक अधिकारों की मांग से जुड़े हुए हैं, जबकि कुछ देशों में इन्हें समानता और विविधता के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

भारत में LGBTQ+ प्राइड आंदोलन की शुरुआत 1999 में कोलकाता रेनबो प्राइड वॉक से मानी जाती है। यह दक्षिण एशिया का पहला संगठित प्राइड मार्च था, जिसने देश में LGBTQ+ समुदाय की दृश्यता और अधिकारों की बहस को नई पहचान दी। इसके बाद मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और कई अन्य शहरों में भी प्राइड परेड आयोजित होने लगीं।

आज प्राइड परेड केवल एक उत्सव नहीं बल्कि इतिहास, संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन चुकी है। यह उन लोगों को सम्मान देने का अवसर है जिन्होंने समान अधिकारों और स्वीकार्यता के लिए लंबा संघर्ष किया। स्टोनवॉल से शुरू हुई यह यात्रा अब वैश्विक स्तर पर विविधता, समानता और मानवाधिकारों के सबसे बड़े सामाजिक आंदोलनों में से एक के रूप में देखी जाती है।

Updated On 30 May 2026 4:38 PM IST
Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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