मुस्लिम देशों का नया गठबंधन : तुर्किये, सऊदी और पाक बनाएंगे 'इस्लामिक NATO'; क्या भारत पर बढ़ेगा दबाव?
सऊदी अरब और पाकिस्तान के रक्षा समझौते में तुर्किये की एंट्री से 'इस्लामिक NATO' की सुगबुगाहट तेज हो गई है। यह गठबंधन परमाणु शक्ति, असीमित धन और आधुनिक ड्रोन तकनीक का एक शक्तिशाली त्रिकोण बना रहा है। जानें कैसे यह समझौता नाटो के 'आर्टिकल 5' की तर्ज पर काम करेगा और भारत की सुरक्षा चिंताओं पर इसका क्या असर होगा। क्या यह वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल देगा? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

Middle East Geopolitics : वैश्विक भू-राजनीति के रंगमंच पर एक ऐसी हलचल शुरू हुई है जिसने वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक के राजनयिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद 'रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते' (Strategic Mutual Defense Agreement) में अब तुर्किये की आधिकारिक एंट्री होने जा रही है। ब्लूमबर्ग की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, तीनों देशों के बीच बातचीत अंतिम चरण में है। इस गठबंधन को विशेषज्ञ 'इस्लामिक NATO' का नाम दे रहे हैं, क्योंकि इसकी शर्तें नाटो के 'आर्टिकल 5' जैसी हैं—यानी किसी एक देश पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा।
तीन शक्तियों का त्रिकोण : कौन क्या लाएगा मेज पर ?
सितंबर 2025 में शुरू हुए इस गठबंधन को तुर्किये के शामिल होने से नई सैन्य और तकनीकी ऊंचाई मिलने की उम्मीद है। यह गठबंधन केवल कागजी समझौता नहीं, बल्कि संसाधनों का एक खतरनाक मेल है:
सऊदी अरब (आर्थिक शक्ति): गठबंधन की रीढ़ के रूप में सऊदी अरब अपना विशाल तेल भंडार और असीमित वित्तीय संसाधन झोंकेगा।
- पाकिस्तान (परमाणु शक्ति): एकमात्र मुस्लिम परमाणु संपन्न राष्ट्र होने के नाते पाकिस्तान इस समूह को परमाणु छतरी, बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक और एक विशाल अनुभवी सेना प्रदान करेगा।
- तुर्किये (तकनीकी शक्ति): नाटो सदस्य तुर्किये अपनी अत्याधुनिक डिफेंस इंडस्ट्री, ड्रोन तकनीक (Bayraktar), 'कान' 5th जनरेशन फाइटर जेट और आधुनिक नौसैनिक युद्धपोत (कोरवेट) से गठबंधन को आधुनिक बनाएगा।
बदलते समीकरण: अमेरिका से मोहभंग और ईरान का कारक
थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहात अली ओजकान के अनुसार, यह गठबंधन अमेरिका की बदलती नीतियों का परिणाम है। मध्य-पूर्व में अमेरिका का इजरायल की ओर बढ़ता झुकाव और पारंपरिक सहयोगियों की अनदेखी ने सऊदी, तुर्किये और पाकिस्तान को एक मंच पर ला खड़ा किया है। अंकारा में हाल ही में हुई तीनों देशों की पहली नौसेना बैठक इस सैन्य एकजुटता की पहली औपचारिक पुष्टि है। हालांकि यह गठबंधन मुख्य रूप से ईरान की बढ़ती ताकत को संतुलित करने और सीरिया-फिलिस्तीन जैसे सुन्नी प्रधान मुद्दों पर साझा रुख अपनाने के लिए बनाया जा रहा है।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
नई दिल्ली इस विकास को अत्यंत गंभीरता से देख रही है। मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना भारत के लिए एक बड़ा सबक था। यद्यपि विशेषज्ञ मानते हैं कि इस गठबंधन का प्राथमिक लक्ष्य भारत नहीं है, लेकिन पाकिस्तान और तुर्किये का कश्मीर मुद्दे पर साझा और भारत विरोधी रुख भारत की चिंता बढ़ा देता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्किये की ड्रोन तकनीक और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता का मेल दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
