नेपाल ने एक बार फिर अपनाया ‘वन चाइना’ सिद्धांत ; क्या भारत पर पड़ सकते हैं गहरे असर?
नेपाल द्वारा ‘वन चाइना’ सिद्धांत की पुनः पुष्टि ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है। यह लेख बताता है कि चीन-नेपाल संबंधों के इस बयान का भारत पर क्या असर पड़ सकता है, क्यों यह महत्वपूर्ण है और इसके संभावित रणनीतिक परिणाम क्या हो सकते हैं।

नेपाल-चाइना
दक्षिण एशिया की कूटनीतिक हलचल के बीच नेपाल ने एक बार फिर चीन के प्रति अपने रुख को स्पष्ट करते हुए ‘वन चाइना’ सिद्धांत के प्रति अटूट समर्थन की घोषणा की है। 4 जनवरी को नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि ताइवान चीन का अभिन्न हिस्सा है और इस मुद्दे पर काठमांडू की स्थिति में कोई बदलाव नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल और चीन अपने राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं—एक ऐसा रिश्ता जिसकी नींव 1955 में पारस्परिक सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर रखी गई थी।
इस आधिकारिक बयान के साथ ही नेपाल ने न केवल बीजिंग को एक कूटनीतिक संदेश दिया, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में उभर रहे शक्ति-संतुलन को भी रेखांकित किया है। हाल के महीनों में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों ने भी ‘वन चाइना’ नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। इसके विपरीत भारत का रुख अधिक संतुलित और सावधानीपूर्ण रहा है—नई दिल्ली ने औपचारिक रूप से ताइवान को एक अलग देश के रूप में मान्यता नहीं दी है, लेकिन उसने ताइपे के साथ व्यापार, तकनीक और सांस्कृतिक स्तर पर अनौपचारिक संबंध मजबूत किए हैं।
नेपाल के इस बयान का भारत के लिए महत्व कई स्तरों पर है। सबसे पहले, यह हिमालयी क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव की याद दिलाता है। नेपाल भौगोलिक रूप से भारत और चीन के बीच स्थित है और उसकी विदेश नीति में किसी भी बदलाव का सीधा असर नई दिल्ली की रणनीतिक गणनाओं पर पड़ता है। चीन पहले से ही नेपाल में बुनियादी ढांचे, ऊर्जा परियोजनाओं और निवेश के माध्यम से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। ‘वन चाइना’ सिद्धांत की सार्वजनिक और स्पष्ट पुष्टि बीजिंग के साथ नेपाल की राजनीतिक निकटता को और मजबूत करती है।
दूसरे, यह घटनाक्रम ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। अमेरिका और उसके सहयोगी ताइवान के मुद्दे पर चीन के खिलाफ मुखर होते जा रहे हैं, वहीं दक्षिण एशियाई देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। नेपाल का बयान इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के छोटे देश चीन के साथ टकराव से बचते हुए स्पष्ट कूटनीतिक रुख अपनाने में सहज महसूस कर रहे हैं।
भारत के लिए संभावित परिणाम बहुआयामी हो सकते हैं। कूटनीतिक स्तर पर नई दिल्ली को यह सुनिश्चित करना होगा कि नेपाल के साथ उसके पारंपरिक और ऐतिहासिक संबंध कमजोर न पड़ें। आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को मजबूत रखना भारत की प्राथमिकता रहेगी, ताकि क्षेत्र में संतुलन बना रहे। साथ ही, भारत को ताइवान के साथ अपने अनौपचारिक रिश्तों को इस तरह आगे बढ़ाना होगा कि वह न तो अनावश्यक तनाव को न्योता दे और न ही अपने रणनीतिक विकल्पों को सीमित करे।
अंततः, नेपाल का ‘वन चाइना’ समर्थन केवल एक औपचारिक बयान नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक धुरी का संकेतक है। यह घटना बताती है कि आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय राजनीति में बड़े देशों के साथ-साथ छोटे राष्ट्रों के फैसले भी शक्ति-संतुलन को नई दिशा देंगे—और भारत के लिए सतर्क, संतुलित और सक्रिय कूटनीति पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
