मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी अस्थिरता पैदा कर दी है, जिसका सीधा असर विमानन ईंधन यानी जेट फ्यूल (ATF) की कीमतों पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जेट ईंधन की कीमतों में 70 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत से भी अधिक की तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है। इस अचानक उछाल ने पूरी वैश्विक विमानन इंडस्ट्री की आर्थिक संरचना को प्रभावित कर दिया है, जहां ईंधन लागत अब एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च का एक बड़ा हिस्सा बन गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ बाजारों में जेट फ्यूल की कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि यह पिछले स्तरों से लगभग दोगुनी हो गई हैं। इसका प्रमुख कारण आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा, रिफाइनरी उत्पादन में सीमाएं और समुद्री व्यापार मार्गों में अवरोध माना जा रहा है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे रणनीतिक मार्गों से होने वाली सप्लाई में बाधा ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति को और अधिक प्रभावित किया है। विमानन उद्योग पर इसका सीधा असर पड़ा है, जहां एयरलाइंस के परिचालन खर्च में ईंधन का हिस्सा अब लगभग 25 प्रतिशत तक पहुंच गया है। बढ़ती लागत के दबाव के चलते कई एयरलाइंस ने हवाई किराए बढ़ाने, उड़ानों में कटौती करने और अपने मुनाफे के अनुमान को घटाने जैसे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

जेट ईंधन की कीमतों में वृद्धि का मुख्य कारण मध्य पूर्व में संघर्ष के चलते तेल आपूर्ति मार्गों का बाधित होना बताया जा रहा है। इसके साथ ही रिफाइनरी में कच्चे तेल की आपूर्ति में कमी और लॉजिस्टिक बाधाएं उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भी कई बार 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने जेट ईंधन की कीमतों को और ऊपर धकेल दिया है।

इस स्थिति का असर केवल कीमतों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि वैश्विक विमानन संचालन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। कई एयरलाइंस ने मार्गों में कटौती की है और अपनी आय के पूर्वानुमानों को संशोधित किया है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता या आपूर्ति मार्ग सामान्य नहीं हो जाते, तब तक यह दबाव बना रह सकता है।

भारत में भी इस वैश्विक उछाल का स्पष्ट असर देखा जा रहा है। देश में विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) की कीमतों में लगभग 8 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जो घरेलू उड़ानों के किराए और परिचालन लागत को सीधे प्रभावित कर रही है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के मामले में यह वृद्धि और अधिक तेज़ है, जहां कई मामलों में कीमतें वैश्विक उछाल के अनुरूप लगभग दोगुनी स्तर तक पहुंच गई हैं। भारत की ATF कीमतें वैश्विक मानकों से जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण मध्य पूर्व में किसी भी तरह की अस्थिरता का प्रभाव तुरंत घरेलू बाजार पर दिखाई देता है। इसी कारण एयरलाइंस के लिए लागत प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गई है।

किराए के स्तर पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। घरेलू उड़ानों में किराए में सीमित वृद्धि देखी गई है, हालांकि सरकार ने अचानक वृद्धि को रोकने के लिए कुछ हद तक मूल्य नियंत्रण और कैपिंग उपाय अपनाए हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में ईंधन लागत का पूरा बोझ यात्रियों पर डाला जा रहा है, जिसके चलते लंबे मार्गों पर टिकटों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि और अतिरिक्त फ्यूल सरचार्ज जोड़ा जा रहा है।

सरकारी स्तर पर भी इस स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। घरेलू ATF मूल्य वृद्धि को लगभग 25 प्रतिशत तक सीमित रखने की कोशिश की गई है ताकि हवाई किराए में अत्यधिक उछाल न आए। इसके साथ ही नीति स्तर पर कर और आपूर्ति संबंधी समायोजन के माध्यम से स्थिति को स्थिर करने के प्रयास जारी हैं। हालांकि एयरलाइंस का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में परिचालन लाभप्रदता बनाए रखना लगातार कठिन होता जा रहा है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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