इजरायल चुनाव 2026: बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर टिकी नजरें
गाजा संघर्ष और घरेलू विभाजनों के बीच इजरायल में संसदीय चुनाव, नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य और लोकतांत्रिक ढांचे की दिशा तय होगी।

इजरायल में संसदीय चुनाव से पहले तेल अवीव की एक इमारत पर लगा बेंजामिन नेतन्याहू का बैनर।
इजरायल में मंगलवार को होने वाले संसदीय चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति, देश के लोकतांत्रिक ढांचे और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य संघर्ष के बाद यह पहला चुनाव है। घरेलू राजनीतिक विभाजन, अंतरराष्ट्रीय आलोचना और लंबे समय से जारी क्षेत्रीय संघर्षों के बीच इस चुनाव को इजरायल के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में से एक माना जा रहा है।
चुनाव से पहले सामने आए जनमत सर्वेक्षणों में मुकाबला बेहद करीबी दिखाई दे रहा है। इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और संसदीय कार्यकाल चार वर्ष का होता है। चुनाव में 3.25 प्रतिशत या उससे अधिक मत प्राप्त करने वाली पार्टी को नेसेट में प्रवेश मिलेगा। सत्ता पर नियंत्रण के लिए दो प्रमुख गठबंधन मैदान में हैं। इनमें लिकुड पार्टी के नेतृत्व वाला नेतन्याहू समर्थक गठबंधन और कई प्रमुख राजनीतिक दलों को साथ लेकर बना विपक्षी गठबंधन शामिल है।
नेतन्याहू के गठबंधन में यूनाइटेड टोरा यहूदी धर्म पार्टी (UTJ), शास, ओत्जमा येहुदित और धार्मिक जियोनिज्म-जहोत जैसी दक्षिणपंथी तथा अति-रूढ़िवादी पार्टियां शामिल हैं। इतामार बेन-ग्विर और बेजलेल स्मोट्रिच जैसे प्रमुख नेता इस गठबंधन की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली याशर पार्टी के साथ डेमोक्रेट्स, यिसराइल बेतेनु और टुगेदर गठबंधन शामिल हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार, किसी भी प्रमुख गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें मिलने की स्पष्ट संभावना नहीं है।
सार्वजनिक प्रसारक KAN के एक सर्वेक्षण में विपक्षी गठबंधन को 52 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है, जबकि लिकुड के नेतृत्व वाले गठबंधन को लगभग 50 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। शेष सीटें अन्य दलों को मिल सकती हैं, जिनमें रा'आम और जॉइंट लिस्ट जैसे प्रमुख अरब राजनीतिक दल भी शामिल हैं। हालांकि, दोनों प्रमुख गठबंधनों के अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ सहयोग करने को लेकर अनिच्छुक रहने के संकेत हैं।
राजनीतिक दलों के बीच इस विभाजन से चुनाव के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया जटिल होने की आशंका है। यदि कोई गठबंधन बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो बाहरी दलों के समर्थन पर निर्भर अल्पमत सरकार बनाने की स्थिति पैदा हो सकती है। बहुमत जुटाने की कोशिशें विफल रहने पर देश में दोबारा चुनाव कराने की नौबत भी आ सकती है।
इस चुनाव में घरेलू सुरक्षा और शासन से जुड़े कई मुद्दे प्रमुखता से उठ रहे हैं। 7 अक्टूबर 2023 के हमलों से पहले सामने आई सुरक्षा संबंधी विफलताओं की जवाबदेही तय करने की मांग बढ़ रही है। अति-रूढ़िवादी समुदाय को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट को लेकर भी असंतोष है। इसके अलावा, नेतन्याहू के विवादास्पद न्यायिक सुधारों पर बहस जारी है। आलोचकों का मानना है कि ये सुधार इजरायल के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर सकते हैं। विपक्षी दल इस चुनाव को इजरायली लोकतंत्र के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में पेश कर रहे हैं और देश में दक्षिणपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता जता रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इजरायल को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। कब्जे वाले वेस्ट बैंक में उसकी बस्ती संबंधी नीतियों और गाजा में सैन्य कार्रवाई पर कई देशों ने असहमति जताई है। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेतन्याहू के संबोधन के दौरान कई प्रतिनिधियों का बाहर निकल जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते असंतोष का प्रमुख उदाहरण रहा।
नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति भी इस चुनाव के केंद्र में है। सुरक्षा संबंधी मामलों से निपटने के उनके तरीके और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों को लेकर उन पर घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा है। उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों के बीच चुनाव में हार उनकी राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकती है और उनके सामने कानूनी चुनौतियां बढ़ने की आशंका भी है। नई सरकार बनने की स्थिति में हालिया हमलों की जांच से जुड़े संभावित कदमों की दिशा भी प्रभावित हो सकती है।
इजरायल के लगभग 12 लाख फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए भी यह चुनाव प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालिया अनुमानों के अनुसार, फिलिस्तीनी मतदाताओं के बीच मतदान लगभग 60 प्रतिशत रहने की संभावना है। अरब राजनीतिक दलों को चुनाव में समर्थन मिलने के आसार हैं। मतदाता भागीदारी को 70 प्रतिशत तक पहुंचाने के उद्देश्य से अभियान चलाने वाले कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि इससे नेसेट में उनका प्रतिनिधित्व मजबूत होगा, हालांकि उनकी उम्मीदवारी पर पहले लगाए गए प्रतिबंध भी इस प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं।
दोनों प्रमुख गठबंधन सार्वजनिक रूप से अरब दलों से दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन सरकार गठन के लिहाज से इन दलों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। किसी भी प्रमुख गठबंधन के पास उनके समर्थन के बिना बहुमत हासिल करने का भरोसेमंद रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। नेतन्याहू ने अरब दलों के साथ संभावित गठबंधन का विरोध करने के लिए अपनी लिकुड पार्टी को प्रमुख राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया है। इसे सत्ता में अपना प्रभाव बनाए रखने की उनकी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
इजरायल के इस चुनाव का परिणाम केवल सरकार के गठन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देश के अरब नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, लोकतांत्रिक संस्थाओं, सुरक्षा संबंधी जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ संबंधों की दिशा प्रभावित होने की संभावना है। करीबी मुकाबले और बहुमत को लेकर अनिश्चितता के बीच चुनाव के बाद होने वाली गठबंधन वार्ताएं भी देश के राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती हैं।

Pratahkal Bureau
प्रातःकाल ब्यूरो, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा ब्यूरो राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
