8 साल की तबाही और 10 लाख लाशें; क्या अमेरिका भी चल रहा है सद्दाम हुसैन की राह?
Iran-Iraq के बीच 8 साल चले भीषण युद्ध की अनकही दास्तां। जानिए कैसे सीमा विवाद और सद्दाम हुसैन की एक गलतफहमी ने खाड़ी देशों को महाविनाश की आग में झोंक दिया।

ईरान और इराक की भौगोलिक सीमाओं को दर्शाता मानचित्र
Iran Iraq War 8 years history : खाड़ी देशों के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय दर्ज है, जिसकी टीस आज भी वैश्विक राजनीति में महसूस की जाती है। वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच 15 दिनों के अस्थायी युद्धविराम ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान उस भीषण मंजर की ओर खींच लिया है, जब ईरान और इराक के बीच आठ वर्षों तक लगातार बारूद बरसता रहा। यह केवल दो पड़ोसियों की जंग नहीं थी, बल्कि यह अहंकार, गलतफहमी और क्षेत्रीय वर्चस्व की वो दास्तां थी जिसने 20वीं सदी के अंत में मानवता को शर्मसार कर दिया था। इराक के तत्कालीन तानाशाह सद्दाम हुसैन को लगा था कि आंतरिक क्रांति से जूझ रहा ईरान कमजोर पड़ चुका है और उसे चंद दिनों में घुटनों पर लाया जा सकता है, लेकिन यह उनका एक ऐसा आत्मघाती आकलन साबित हुआ जिसने दोनों देशों को बर्बादी की कगार पर खड़ा कर दिया।
इस महायुद्ध की नींव 22 सितंबर 1980 को पड़ी, जब इराकी सेना ने अचानक ईरानी सरजमीं पर धावा बोल दिया। जंग की मुख्य वजह 'शत्त-अल-अरब' जलमार्ग पर कब्जे का पुराना विवाद था, जो तेल निर्यात के लिए दोनों देशों की जीवन रेखा माना जाता था। हालांकि, पर्दे के पीछे असल डर विचारधारा का था। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद इराक को भय था कि आयतुल्लाह खुमैनी की लहर उसके देश की शिया आबादी को भी उकसा सकती है। सद्दाम हुसैन खुद को अरब जगत का निर्विवाद नेता बनाना चाहते थे और उन्हें लगा कि यह पड़ोसी को कुचलने का सबसे सटीक समय है।
आठ वर्षों तक खिंची इस लंबी लड़ाई में मौतों का जो तांडव हुआ, उसने रूह कंपा दी। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक, इस युद्ध में 5 लाख से 10 लाख के बीच लोग मारे गए। यह युद्ध केवल मोर्चों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि 'शहरों की जंग' के रूप में रिहायशी इलाकों, तेल के कुओं और समुद्री टैंकरों तक फैल गया। रासायनिक हथियारों का भयावह इस्तेमाल और मिसाइलों की गूंज ने पूरी एक पीढ़ी को अपंग और विस्थापित कर दिया। अरबों डॉलर की संपत्ति राख हो गई और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं दशकों पीछे चली गईं।
युद्ध के इतना लंबा खिंचने का सबसे बड़ा कारण 'अहंकार की दीवार' थी। न तो इराक पीछे हटने को तैयार था और न ही ईरान हार मानने को। कई अंतरराष्ट्रीय ताकतों ने अपने निजी हितों के लिए हथियारों की सप्लाई जारी रखी, जिससे यह आग बुझने के बजाय और भड़कती रही। अंततः, जब दोनों देशों की सांसें उखड़ने लगीं और अंतरराष्ट्रीय दबाव चरम पर पहुंच गया, तब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हस्तक्षेप किया। 1988 में 'प्रस्ताव 598' के तहत एक रूपरेखा तैयार की गई, जिसे दोनों पक्षों ने भारी मन से स्वीकार किया। 20 अगस्त 1988 को आधिकारिक रूप से सीजफायर लागू हुआ और सेनाएं अपनी पुरानी सीमाओं पर लौटने को राजी हुईं।
आज जब अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता की मेज सज रही है, तो इतिहास का यह पन्ना एक चेतावनी की तरह खड़ा है। युद्धविराम शांति की दिशा में पहला कदम जरूर है, लेकिन ईरान-इराक युद्ध सिखाता है कि युद्ध शुरू करना तो आसान है, मगर उसे खत्म करने की कीमत कई पीढ़ियों को चुकानी पड़ती है। दुनिया की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति इस बार इतिहास को खुद को दोहराने से रोक पाएगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
