हर वर्ष 21 फरवरी को पूरी दुनिया एक ऐसे दिन को याद करती है, जो केवल भाषाई विविधता का उत्सव नहीं, बल्कि मातृभाषा के सम्मान के लिए दिए गए अद्वितीय बलिदान की स्मृति भी है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण तथा बहुभाषिकता को बढ़ावा देने का वैश्विक संकल्प है। यह दिन उन लोगों की स्मृति में समर्पित है जिन्होंने अपनी मातृभाषा के अधिकार के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।


यूनेस्को की घोषणा और संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक मान्यता:

इस दिवस की आधिकारिक घोषणा 17 नवंबर 1999 को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) द्वारा की गई थी। इसके बाद वर्ष 2002 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 56/262 को अपनाकर इसे औपचारिक मान्यता प्रदान की। 21 फरवरी 2000 से यह दिवस विश्वभर में मनाया जा रहा है।


इस ऐतिहासिक दिवस की पृष्ठभूमि 1947 में पाकिस्तान के गठन से जुड़ी है। उस समय पाकिस्तान दो भौगोलिक भागों में विभाजित था—पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान। दोनों क्षेत्रों के बीच न केवल हजारों किलोमीटर की दूरी थी, बल्कि सांस्कृतिक और भाषाई भिन्नताएं भी गहरी थीं। 1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को देश की एकमात्र राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया, जबकि पूर्वी पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी की मातृभाषा बांग्ला थी।


इस निर्णय का व्यापक विरोध हुआ। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मांग की कि बांग्ला को भी उर्दू के साथ राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए। यह मांग 23 फरवरी 1948 को पाकिस्तान की संविधान सभा में पूर्वी पाकिस्तान के प्रतिनिधि धीरेंद्रनाथ दत्ता द्वारा औपचारिक रूप से उठाई गई। लेकिन सरकार ने इस विरोध को दबाने के लिए सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया।



21 फरवरी 1952: जब गोलियों से गूंज उठा ढाका

प्रतिबंधों के बावजूद, ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आम जनता के समर्थन से 21 फरवरी 1952 को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन आयोजित किए। स्थिति तब गंभीर हो गई जब पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी। इस गोलीबारी में अब्दुस सलाम, अबुल बरकत, रफीक उद्दीन अहमद, अब्दुल जब्बार और शफिउर रहमान शहीद हो गए, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए। इतिहास में यह एक दुर्लभ घटना थी जब लोगों ने अपनी मातृभाषा के अधिकार के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया।


इन शहीदों की स्मृति में ढाका में शहीद मीनार का निर्माण किया गया, जो आज भी मातृभाषा के सम्मान और भाषाई अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक है। हर वर्ष 21 फरवरी को बांग्लादेश में लोग इस स्मारक पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह दिन वहां राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है और पूरे देश में शोक, सम्मान और गर्व के साथ याद किया जाता है।


वैश्विक मान्यता के पीछे प्रवासी समुदाय की पहल:

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दिवस को मान्यता दिलाने में प्रवासी बंगाली समुदाय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। कनाडा के वैंकूवर में रहने वाले बंगाली नागरिक रफीकुल इस्लाम और अब्दुस सलाम ने 9 जनवरी 1998 को तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव को पत्र लिखकर विश्व की लुप्त होती भाषाओं को बचाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करने का अनुरोध किया। उन्होंने 21 फरवरी की तिथि का प्रस्ताव रखा, ताकि 1952 के शहीदों के बलिदान को वैश्विक पहचान मिल सके।


अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल बांग्लादेश या दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्व समुदाय के लिए एक साझा संदेश है—भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और इतिहास की जीवित धरोहर है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषाई विविधता मानव सभ्यता की शक्ति है, और इसे संरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी भी।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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