मुंबई। शुक्रवार को भारतीय रुपया इतिहास के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गया। बाजार बंद होते ही डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 89.49 तक पहुंच गई, जो पिछले समर्थन स्तर 88.80 को पार करते हुए एक नई रिकॉर्ड दर बन गई। यह गिरावट 78 पैसे की रही, जो मार्च‑मई के बाद एक दूसरे सबसे बड़े एक‑दिवसीय नुकसान का संकेत देती है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस अचानक कमजोरी के पीछे कई जटिल आर्थिक और वैश्विक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की भारी निकासी है। साल की शुरुआत से अब तक विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स ने लगभग 16.5 अरब डॉलर भारत की इक्विटी बाजारों से निकाल लिए हैं, जिससे रुपये पर बिकवाली की प्रवृत्ति तेज हुई। इस प्रक्रिया में रुपये की कमजोर स्थिति और गहराई तक पहुंच गई।

इसके अलावा, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता ने निवेशकों को सतर्क किया है। हाल ही में अमेरिका ने कुछ भारतीय कंपनियों पर ईरानी तेल लेन‑देन में शामिल होने का आरोप लगाया, जिससे द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ। ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।

तीसरा महत्वपूर्ण कारक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति है। फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में संभावित कटौती के अवसर घटने से डॉलर मजबूत हुआ है, और यह उभरती बाजार मुद्राओं, विशेष रूप से रुपये, पर दबाव डाल रहा है। रुपये के 88.80 के स्तर से नीचे जाने के बाद “स्टॉप‑लॉस” ऑर्डर्स सक्रिय हो गए, जिसने गिरावट को और तेज किया। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस बार भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में पहले जैसी सक्रिय हस्तक्षेप रणनीति नहीं अपनाई।

इक्विटी और बांड बाजारों में इसका असर तुरंत दिखाई दिया। रुपये की कमजोरी के साथ 10-वर्षीय सरकारी बांड की यील्ड में भी वृद्धि हुई, जो निवेशकों की चिंता और मुद्रा अस्थिरता को दर्शाती है। RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा पहले ही कह चुके हैं कि केंद्रीय बैंक किसी निश्चित रुपये‑दौलर स्तर का लक्ष्य नहीं रखता। हालांकि, रुपये के 89 स्तर को पार करने के बाद RBI ने हस्तक्षेप करते हुए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की।

इस घटना का अर्थव्यवस्था पर मिश्रित प्रभाव होगा। निर्यातकों के लिए यह अस्थायी रूप से लाभदायक साबित हो सकता है क्योंकि उनकी विदेशी मुद्रा में आय बढ़ेगी, लेकिन आयातकों के लिए लागत और महंगाई बढ़ सकती है। इसके साथ ही पूंजी बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिससे निवेशकों की मनोस्थिति प्रभावित होगी।

रुपये का यह ऐतिहासिक गिरना न केवल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी है, बल्कि यह वैश्विक वित्तीय अस्थिरता, द्विपक्षीय व्यापार तनाव और मौद्रिक नीतियों के संगम का भी प्रतीक बन गया है। आने वाले दिनों में विदेशी मुद्रा बाजार पर निगाहें और भी तीखी रहने की संभावना है, और RBI को संतुलन बनाये रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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