Iran-US शांति वार्ता के बीच वॉशिंगटन में भारत-अमेरिका की कूटनीति; क्या यह कोई नई ट्रेड डील है ?
इस्लामाबाद में ईरान-US शांति वार्ता के बीच वॉशिंगटन में भारत-अमेरिका ट्रेड टॉक शुरू। नए अमेरिकी टैरिफ नियमों और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच बीटीए समझौते पर होगी अहम चर्चा।

India US trade talk Washington : वैश्विक कूटनीति के पटल पर इस वक्त एक बेहद दिलचस्प और जटिल खेल चल रहा है। एक तरफ इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका शांति की मेज पर बैठे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ दुनिया की निगाहें वॉशिंगटन पर टिक गई हैं, जहां भारत और अमेरिका व्यापारिक समीकरणों की नई बिसात बिछाने जा रहे हैं। सोमवार, 20 अप्रैल से वॉशिंगटन में दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता (ट्रेड टॉक) का एक बेहद अहम और नया दौर शुरू हो रहा है। तीन दिनों तक (20 से 22 अप्रैल) चलने वाली इस गहन कूटनीतिक मंत्रणा का मुख्य उद्देश्य प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के पहले चरण को अंतिम रूप देना है। यह बैठक इसलिए भी खास है क्योंकि अक्टूबर 2025 के बाद यह पहला मौका है, जब भारत के मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन के नेतृत्व में वाणिज्य, सीमा शुल्क और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का 12 सदस्यीय उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल अमेरिका के साथ आमने-सामने की बातचीत करेगा।
इस महत्वपूर्ण वार्ता की पृष्ठभूमि हाल ही में अमेरिकी नीतियों में आए एक बड़े बदलाव से जुड़ी है। दरअसल, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया था, जिसके बाद अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था में भारी उलटफेर हुआ है। इसके जवाब में, वॉशिंगटन ने 24 फरवरी से 23 जुलाई तक 150 दिनों के लिए दुनिया के सभी देशों पर एक समान 10% का अस्थायी टैरिफ थोप दिया है। भारत के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि पिछली शर्तों के अनुसार भारतीय उत्पादों पर लगने वाला 50% का अमेरिकी टैरिफ घटकर 18% होने वाला था और रूस से तेल खरीद पर लगने वाला 25% जुर्माना भी हटने की उम्मीद थी। लेकिन अमेरिका के इस 'यूनिवर्सल 10% टैरिफ' ने उन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। चूँकि समझौते पर अभी औपचारिक हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, इसलिए भारत के पास शर्तों पर पुनर्विचार करने का पूरा मौका है। भारतीय अधिकारी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस नए वैश्विक टैरिफ ढांचे के कारण भारत को कोई आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े, इसलिए पूरे समझौते को फिर से बारीकी से परखा जाएगा।
भारत का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी बाजार में अपनी खोई हुई 'कॉस्ट एडवांटेज' (लागत लाभ) को वापस पाना है। इसके साथ ही, फरवरी में हुए प्रारंभिक समझौते के तहत भारत ने अमेरिका को जो भारी रियायतें (जैसे- अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं पर टैरिफ कम करना और कृषि उत्पादों पर शुल्क घटाना) दी थीं, अब उन पर भी भारत अपना रुख कड़ा कर सकता है। इसके अलावा, भारत ने अगले 5 सालों में ऊर्जा, विमान और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने का जो संकेत दिया था, उस पर भी नए सिरे से मोलभाव होने की पूरी संभावना है। एक और बड़ा विवादित मुद्दा अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) द्वारा धारा 301 के तहत भारत के खिलाफ चल रही जांच है, जिसे भारत अनुचित बताकर रद्द करने का भारी दबाव बना रहा है।
फरवरी में टैरिफ विवाद के कारण स्थगित हुई वार्ता का यह नया दौर पूरी तरह से बदले हुए वैश्विक हालात में हो रहा है। इसके रणनीतिक मायने इसलिए भी बढ़ जाते हैं क्योंकि वित्तीय वर्ष 2025-26 में चीन, अमेरिका को पछाड़कर फिर से भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। इस दौरान अमेरिका को भारत का निर्यात 0.92% बढ़कर 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 15.95% की भारी उछाल के साथ 52.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जिससे भारत का ट्रेड सरप्लस 40.89 अरब डॉलर से गिरकर 34.4 अरब डॉलर पर आ गया है। ऐसे में वॉशिंगटन में हो रही यह तीन दिवसीय वार्ता न केवल भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों का भविष्य तय करेगी, बल्कि एशिया में चीन के बढ़ते आर्थिक दबदबे को संतुलित करने में भी मील का पत्थर साबित हो सकती है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
