हिमालय की चोटियों पर जमी बर्फ और रिश्तों की कड़वाहट

भारत और चीन के बीच हिमालयी सीमाओं पर पिछले कई दशकों से खींचतान जारी है। साल 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में जो दरार आई, वह आज 2026 में भी पूरी तरह भर नहीं पाई है। इस हफ्ते सीमा मामलों पर हुई नई कूटनीतिक चर्चाओं ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। एक तरफ जहां बातचीत के मेज पर 'शांति और स्थिरता' के शब्द गूंज रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बुनियादी ढांचे का निर्माण और सेनाओं की तैनाती एक अलग ही कहानी बयां कर रही है।

ताज़ा कूटनीतिक हलचल और बयानों के मायने

हाल ही में दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में 'समान और आपसी सुरक्षा' के सिद्धांत पर चर्चा हुई। चीन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि सीमा की स्थिति "स्थिर" है, जबकि भारत ने स्पष्ट किया कि जब तक सीमा पर पूरी तरह से 'डिसइंगेजमेंट' (सेनाओं की वापसी) और 'डी-एस्केलेशन' (तनाव कम करना) नहीं होता, तब तक द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते।

भारत का रुख कड़ा और साफ़ है: 'शांति के बिना प्रगति संभव नहीं।' भारतीय विदेश मंत्रालय ने जोर दिया है कि सीमा पर गश्त के पुराने अधिकारों की बहाली ही किसी भी समझौते की पहली शर्त होनी चाहिए।

LAC पर जमीनी हकीकत: निर्माण और चुनौती

सिर्फ बयानों से स्थिति स्पष्ट नहीं होती। उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने एलएसी के पास अपने क्षेत्रों में सड़कों, पुलों और हेलीपैडों का जाल बिछा दिया है। जवाब में भारत ने भी "वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम" और रणनीतिक सुरंगों (जैसे सेला टनल) के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की है।

विवाद के मुख्य बिंदु अब भी वही हैं:

  • डेपसांग और डेमचोक: यहाँ गश्त को लेकर गतिरोध अभी भी बना हुआ है।
  • बफर जोन: कई इलाकों में बनाए गए बफर जोन के कारण भारतीय चरवाहों और सैनिकों की पहुंच कुछ क्षेत्रों तक सीमित हो गई है।

संसद में राजनीतिक घमासान

सीमा का यह मुद्दा केवल सामरिक नहीं रहा, बल्कि अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। इस हफ्ते संसद में विपक्षी दलों ने सरकार को घेरते हुए कई तीखे सवाल पूछे:

  • क्या चीन ने भारतीय जमीन पर कब्जा किया है?
  • सरकार सीमा पर "यथास्थिति" (Status Quo) बहाल करने में देरी क्यों कर रही है?
  • चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन कैसे बनेगा?

विपक्ष का आरोप है कि सरकार सीमा की स्थिति पर पारदर्शिता नहीं बरत रही है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि भारत की एक इंच जमीन भी किसी के पास नहीं है और सेना को पूरी छूट दी गई है।

सुरक्षा रणनीति और 'चीन प्लस वन' नीति

भारत अब केवल सैन्य रूप से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी चीन को चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रहा है। सरकार ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने से लेकर टेलीकॉम सेक्टर में चीनी उपकरणों के इस्तेमाल को सीमित करने तक कई कड़े कदम उठाए हैं। रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत भारत अब अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए स्वदेशी ड्रोन्स, मिसाइल सिस्टम और सर्विलांस तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।

भविष्य की राह: क्या युद्ध विकल्प है?

विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु शक्ति संपन्न दो पड़ोसी देशों के बीच पूर्ण युद्ध किसी के हित में नहीं है। हालांकि, 'कोल्ड वॉर' जैसी स्थिति लंबे समय तक बनी रह सकती है। चीन की विस्तारवादी नीति और भारत की संप्रभुता के प्रति अडिगता के बीच समाधान का रास्ता केवल 'डायलॉग' से ही निकल सकता है, बशर्ते वह 'विश्वास' पर आधारित हो।

भारत-चीन सीमा पर वर्तमान चर्चा का दौर उम्मीद तो जगाता है, लेकिन इतिहास हमें सतर्क रहने की सलाह देता है। जब तक एलएसी पर 2020 से पहले वाली स्थिति बहाल नहीं होती, तब तक इन चर्चाओं को केवल "प्रक्रिया का हिस्सा" माना जाना चाहिए, "समाधान" नहीं। भारत को अपनी सैन्य तैयारी और कूटनीतिक धार दोनों को पैना रखना होगा।

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