Shaksgam Valley Conflict : हिमालय की दुर्गम चोटियों के बीच स्थित सामरिक रूप से अति-संवेदनशील शक्सगाम घाटी एक बार फिर भारत और चीन के बीच कूटनीतिक टकराव का नया केंद्र बन गई है। चीन ने जम्मू-कश्मीर की इस घाटी में अपनी विवादास्पद बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर भारत की कड़ी आपत्ति को सिरे से खारिज कर दिया है। बीजिंग का यह अड़ियल रुख न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए चुनौती है, बल्कि यह भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता पर सीधे प्रहार के रूप में देखा जा रहा है।

चीन का दावा: 'अपने इलाके में निर्माण हमारा हक'

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने 12 जनवरी 2026 को बीजिंग में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में स्पष्ट किया कि शक्सगाम घाटी चीन का अविभाज्य हिस्सा है। उन्होंने भारत की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कहा कि चीन को अपने क्षेत्र में बुनियादी ढांचे (सड़क और सीपेक परियोजनाओं) के विकास का पूर्ण संप्रभु अधिकार है। माओ निंग ने 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते का हवाला देते हुए इसे दो स्वतंत्र राष्ट्रों के बीच का वैध फैसला करार दिया।

  • भारत का पलटवार: अवैध कब्जे को कभी नहीं मिलेगी मान्यता
  • चीन के इस दावे पर भारत सरकार ने बेहद सख्त और स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 9 जनवरी को ही बीजिंग के मंसूबों को भांपते हुए कड़ा संदेश जारी किया था:
  • अवैध समझौता: भारत ने साफ किया है कि वह 1963 के तथाकथित 'चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते' को सिरे से खारिज करता है। भारत के अनुसार, पाकिस्तान द्वारा भारत की भूमि किसी तीसरे देश को सौंपना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है।
  • सीपेक (CPEC) पर विरोध: भारत ने दोहराया है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भारत की संप्रभुता का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह उन क्षेत्रों (गिलगित-बाल्टिस्तान) से गुजरता है जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में हैं।
  • अखंड भारत: नई दिल्ली ने स्पष्ट रूप से कहा है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं और रहेंगे।

रणनीतिक महत्व और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य :

शक्सगाम घाटी का इतिहास विवादों और विश्वासघात की गाथा है। 1948 में पाकिस्तान ने इस पर अवैध कब्जा किया और फिर 1963 में कूटनीतिक लाभ के लिए इसे चीन को 'उपहार' स्वरूप दे दिया।

  • अरब सागर तक पहुंच: चीन के लिए यह इलाका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि करीब 60 बिलियन डॉलर की लागत वाला सीपेक प्रोजेक्ट उसे सीधा अरब सागर और ग्वादर पोर्ट तक पहुंच प्रदान करता है।
  • सामरिक बढ़त: यहाँ सड़कों और रेलवे का निर्माण चीन को भारतीय सीमाओं (विशेषकर सियाचिन) के करीब सैन्य रसद पहुँचाने की बड़ी शक्ति देता है।
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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