दावोस/स्विट्जरलैंड: बर्फ की चादर ओढ़े स्विट्जरलैंड के शांत शहर दावोस में अगले सप्ताह से हलचल तेज होने वाली है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राजनेताओं, व्यापारिक दिग्गजों और अर्थशास्त्रियों का जमावड़ा 'विश्व आर्थिक मंच' (World Economic Forum - WEF) की वार्षिक बैठक के लिए लगने जा रहा है। लेकिन इस बार की हवाओं में केवल ठंडक नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक तनाव भी महसूस किया जा रहा है। यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" (America First) नीति और उनके द्वारा लगाए गए नए व्यापारिक प्रतिबंधों ने दशकों पुरानी 'नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था' की नींव हिला दी है।

एजेंडे पर व्यापारिक युद्ध और आर्थिक संरक्षणवाद

दावोस सम्मेलन का मुख्य आकर्षण इस बार किसी नई तकनीक या क्लाइमेट चेंज से ज्यादा 'आर्थिक संप्रभुता' रहने वाली है। अमेरिका द्वारा ईरान और अन्य व्यापारिक साझेदारों पर लगाए गए कड़े टैरिफ और प्रतिबंधों ने यूरोपीय संघ और एशियाई शक्तियों को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। वैश्विक नेताओं के बीच इस बात को लेकर गंभीर चर्चा तेज हो गई है कि क्या विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियम अब भी प्रासंगिक हैं।

सम्मेलन के प्रमुख केंद्र बिंदु

इस वर्ष की बैठक में जिन विषयों पर सबसे अधिक गर्मागर्म बहस होने की संभावना है, वे निम्नलिखित हैं:

व्यापारिक प्रतिबंध और टैरिफ: ट्रंप प्रशासन की 25% अतिरिक्त टैरिफ वाली चेतावनी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को लेकर चिंतित हैं।

बहुपक्षवाद बनाम संरक्षणवाद: क्या दुनिया फिर से गुटों में बंट रही है? यूरोपीय नेता 'नियम-आधारित व्यवस्था' को बचाने के लिए एक साझा मंच तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

सेमीकंडक्टर और एआई डिप्लोमेसी: भविष्य की तकनीक पर किसका नियंत्रण होगा, इसे लेकर अमेरिका और चीन के बीच चल रही रस्साकशी दावोस के गलियारों में भी सुनाई देगी।

ऊर्जा संकट और ईरान: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और प्रतिबंधों के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता पर चर्चा की जाएगी।

आधिकारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण

विश्व आर्थिक मंच के आयोजकों का मानना है कि यह सम्मेलन बातचीत का आखिरी बड़ा मौका है, जहाँ अमेरिका और उसके विरोधियों को एक ही छत के नीचे बैठकर सुलह की संभावनाएं तलाशनी होंगी। हालांकि, जानकारों का कहना है कि जिस तरह से वाशिंगटन ने आक्रामक रुख अपनाया है, उससे 'ग्लोबल कोऑपरेशन' (Global Cooperation) के पुराने ढांचे का बिखरना तय लग रहा है। कई विकासशील देश अब डॉलर पर निर्भरता कम करने और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को प्राथमिकता देने पर विचार कर रहे हैं।

निष्कर्ष: दावोस की प्रासंगिकता पर सवाल

दावोस 2026 केवल एक आर्थिक बैठक नहीं, बल्कि इस बात का परीक्षण है कि क्या दुनिया अब भी सहयोग में विश्वास रखती है या फिर 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली नीति ही नया वैश्विक मानदंड बनेगी। ट्रंप के आर्थिक अल्टीमेटम ने दावोस के पारंपरिक एजेंडे को पूरी तरह से बदल दिया है। अगले सप्ताह होने वाली चर्चाएं यह तय करेंगी कि 2026 की वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रगति की ओर बढ़ेगी या फिर एक अंतहीन व्यापारिक युद्ध की ओर।

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