भारत में प्रदूषण का संकट लगातार गंभीर रूप ले रहा है। विशेष रूप से उत्तर भारत में सर्दियों के मौसम में जहरीली धुएं, धूल भरी हवा और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियां आम जनजीवन को प्रभावित करती हैं। हालाँकि भारत ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और स्वच्छ भारत मिशन जैसी पहलें शुरू की हैं, साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा जैसे नवीनीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन प्रदूषण की दर अभी भी नियंत्रण से बाहर है। बढ़ती शहरी आबादी, यातायात की बढ़ती संख्या और पराली जलाने जैसी परंपराओं ने इन प्रयासों की गति को धीमा कर दिया है।

इस बीच, चीन का अनुभव भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक साबित हो सकता है। एक दशक पहले तक चीन भी प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा था, लेकिन उसने अपने नीति निर्धारण और सख्त कार्यान्वयन के जरिए वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हासिल किया। चीन ने प्रदूषण को राष्ट्रीय आपातकाल मानते हुए तेज गति से कार्य किया। सबसे पहले, उसने एक व्यापक रियल-टाइम वायु निगरानी नेटवर्क स्थापित किया, जो शहर-दर-शहर और उद्योग-दर-उद्योग उत्सर्जन का सटीक डेटा उपलब्ध कराता था। इसके आधार पर नीतियाँ बनाई गईं और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय तत्काल लागू किए गए।

परिवहन के क्षेत्र में चीन ने सार्वजनिक परिवहन और मेट्रो नेटवर्क का विस्तार किया, चौड़े पैदल यात्री क्षेत्र बनाए और निजी वाहनों पर निर्भरता कम की। इसके साथ ही, उद्योगों में स्वच्छ ईंधन और नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दिया गया। कोयला आधारित इकाइयों को गैस आधारित बॉयलरों से प्रतिस्थापित किया गया, जिससे सल्फर उत्सर्जन में भारी कमी आई। शेन्जेन जैसे शहरों ने 2017 तक पूरी तरह विद्युतीकरण कर दुनिया में इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई।

भारत में भी इस दिशा में प्रयास जारी हैं। सौर और पवन ऊर्जा में भारी निवेश हो रहा है, जल विद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है और कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए नीतियाँ बनाई जा रही हैं। नागरिक स्तर पर भी जागरूकता बढ़ रही है। लोग कचरा जलाने से बच रहे हैं, प्लास्टिक का उपयोग घटा रहे हैं और स्थानीय वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए पेड़ लगा रहे हैं।

हालांकि, भारत के प्रयासों की गति और प्रवर्तन में चीन जैसी तीव्रता की कमी है। यदि भारत चीन की तरह व्यापक निगरानी तंत्र, सार्वजनिक परिवहन का सुधार और उद्योगों में स्वच्छ तकनीकों का तेजी से कार्यान्वयन करता है, तो प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकता है। भारत के लिए यह चुनौती केवल नीति निर्धारण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे हर स्तर पर क्रियान्वित करना होगा। चीन का उदाहरण दर्शाता है कि सतत निगरानी, सख्त नियम और नागरिक सहभागिता से प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।

समग्र रूप में, भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह चीन के अनुभव से सीख लेकर अपनी रणनीतियों को प्रभावी और तेजी से लागू करे। केवल सरकारी पहल ही नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी और तकनीकी समाधानों का एकीकृत दृष्टिकोण ही वायु प्रदूषण को कम करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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