क्यों मानते हैं कोल माइनर्स डे? जानिए इस दिन का महत्व और खनिकों के वैश्विक अधिकार का विश्लेषण
कोयला खनन का इतिहास औद्योगिक क्रांति से शुरू होकर आज के वैश्विक ऊर्जा उद्योग तक फैला हुआ है। यह लेख खनिकों के श्रमिक आंदोलनों, राजनीतिक संघर्षों, ब्रिटेन के राष्ट्रीयकरण, 1984–85 हड़ताल, विश्व के भीषण खनन हादसों जैसे सेंगहेनिड, कोरिएर, बेनक्सीहु की वर्तमान स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।

कोयला खदान के भीतर कार्यरत खनिक
कोयला खनन, जिसे मानव सभ्यता की औद्योगिक प्रगति की रीढ़ माना जाता है, सदियों से श्रमिक जीवन, राजनीतिक आंदोलनों और वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था का एक निर्णायक हिस्सा रहा है। यद्यपि लोग प्राचीन काल से ही कोयला खदानों में कार्यरत रहे हैं, लेकिन औद्योगिक क्रांति के दौरान जब भाप इंजनों, लोकोमोटिव और भवनों के ताप हेतु बड़े पैमाने पर कोयले का उपयोग शुरू हुआ, तब इस उद्योग का महत्व अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया।
उस दौर से ही कोयला खनिक न केवल औद्योगिक उत्पादन का आधार बने, बल्कि वे श्रमिक आंदोलनों और राजनीतिक संघर्षों के केंद्र में भी आ गए। ऊर्जा के इस प्रमुख स्रोत की रणनीतिक भूमिका के कारण कोयला खनिकों ने श्रमिक अधिकार आंदोलनों में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, और कई देशों में उनकी भूमिका राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली रही।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी तक कोयला खनिकों ने संगठित श्रमिक आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाई। कई देशों में वे वामपंथी और समाजवादी आंदोलनों के प्रमुख आधार बने। ब्रिटेन, पोलैंड, जापान, कनाडा और चिली जैसे देशों में खनिक यूनियनों ने श्रमिक संघर्षों को नई दिशा दी। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, 1880 के दशक से लेकर 20वीं शताब्दी के अंत तक कोयला खनिक औद्योगिक श्रमिक वर्ग के सबसे संघर्षशील और सक्रिय हिस्सों में गिने जाते रहे।
ब्रिटेन में 1889 से 1921 के बीच खनिकों की हड़तालें अन्य श्रमिक समूहों की तुलना में दो से तीन गुना अधिक दर्ज की गईं। स्कॉटलैंड जैसे क्षेत्रों में यह संघर्ष और भी तीव्र था। वहीं ब्रिटिश कोल माइनर्स ने लेबर पार्टी और कम्युनिस्ट आंदोलन की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जर्मनी में 1889, 1905 और 1912 की बड़ी हड़तालों ने उनकी संघर्षशीलता को दर्शाया, हालांकि राजनीतिक रूप से वे अपेक्षाकृत मध्यमार्गी बने रहे।
कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में खनिकों को “स्वतंत्र और कठोर स्वभाव” वाला माना गया, जो अत्यंत संघर्षशील श्रमिक आंदोलन का हिस्सा बने। चिली में 1930 और 1940 के दशक में खनिकों ने कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन किया, हालांकि 1947 की हड़ताल के बाद सैन्य दमन ने उनकी राजनीतिक उपलब्धियों को सीमित कर दिया। पूर्वी यूरोप में 1945 के बाद कोयला खनिक सबसे अधिक राजनीतिक रूप से सक्रिय वर्ग के रूप में उभरे। पोलैंड में उन्होंने न केवल कम्युनिस्ट सरकार का समर्थन किया, बल्कि 1980 के दशक में सॉलिडैरिटी आंदोलन का भी हिस्सा बने।
ब्रिटेन में 1947 में सभी कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें नेशनल कोल बोर्ड के अधीन कर दिया गया। 1950 में जहां 7 लाख से अधिक श्रमिक कार्यरत थे, वहीं 1960 तक यह संख्या घटकर लगभग 6.34 लाख रह गई। धीरे-धीरे उद्योग में गिरावट आती गई और 1984–85 की ऐतिहासिक खनिक हड़ताल ब्रिटिश इतिहास की सबसे कड़वी औद्योगिक संघर्षों में से एक बन गई। इसके बाद 1990 के दशक में निजीकरण की प्रक्रिया के तहत ब्रिटिश कोल का पुनर्गठन हुआ, लेकिन कई खदानें बंद होती चली गईं। 2013 तक ब्रिटेन में केवल लगभग 4,000 खनिक ही 30 स्थानों पर कार्यरत रह गए थे, जो कुल 13 मिलियन टन कोयले का उत्पादन कर रहे थे।
खनन उद्योग हमेशा से ही अत्यंत जोखिमपूर्ण रहा है। मीथेन गैस विस्फोट, खदानों की छतों का गिरना और कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तता जैसी घटनाएं आम रही हैं। 1913 में दक्षिण वेल्स के सेंगहेनिड खदान हादसे में 436 श्रमिकों की मृत्यु हुई, जो ब्रिटेन का सबसे बड़ा खनन हादसा माना जाता है। इससे पहले 1862 का हार्टले कोलियरी और 1866 का ओक्स विस्फोट भी भीषण त्रासदियाँ थीं।
फ्रांस में 1906 का कोरिएर खदान हादसा यूरोप का सबसे बड़ा खनन हादसा बना, जिसमें 1,099 श्रमिकों की मौत हुई। यह रिकॉर्ड 1942 में चीन के बेनक्सीहु हादसे ने तोड़ा, जिसमें 1,549 खनिकों की जान गई। खनन के दुष्प्रभाव केवल खदानों तक सीमित नहीं रहे। वेल्स के एबरफैन हादसे में कोलियरी के अवशेष ढेर गिरने से एक स्कूल तबाह हो गया, जिसमें भारी जनहानि हुई। कनाडा के स्प्रिंगहिल और अन्य हादसों को स्मरण करते हुए अनेक लोकगीत भी रचे गए।
वैश्विक स्तर पर, वर्ष 2024 तक दुनिया में लगभग 2.7 मिलियन कोयला खनिक कार्यरत बताए गए हैं, जिनमें अधिकांश चीन और भारत में हैं। भारत में हर वर्ष 4 मई को ‘कोल माइनर्स डे’ मनाया जाता है, जो इस कठिन और जोखिमपूर्ण पेशे में कार्यरत श्रमिकों के योगदान और बलिदान को सम्मानित करता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
