china japan taiwan conflict asian crisis : एशिया में तनाव की आंच इन दिनों तेज़ होती जा रही है। ताइवान को लेकर चीन और जापान आमने-सामने खड़े हैं, और हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि एशिया में युद्ध की आहट महसूस होने लगी है। इसी उफनते माहौल के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फोन पर हुई बातचीत ने संकेत दिया है कि ताइवान मसला अब सिर्फ क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बन चुका है।

बीते सोमवार को हुई इस अहम बातचीत में दोनों नेताओं ने बुसान सम्मेलन में बनी सहमति को दोहराया और कहा कि चीन-अमेरिका संबंध सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन बातचीत का मूल विषय वही रहा—ताइवान। शी जिनपिंग ने साफ कहा कि ताइवान का चीन में लौटना 1945 के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है और यह वही व्यवस्था है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखी। ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि अमेरिका समझता है कि ताइवान चीन के लिए कितना संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा है।

इस बीच, जापान की नई प्रधानमंत्री साने ताकाइची द्वारा ताइवान को लेकर लगातार दिए जा रहे तीखे बयान एशियाई सुरक्षा ढांचे को हिला रहे हैं। जापान सरकार का हालिया रुख चीन की दृष्टि में सीधे ‘‘वन-चाइना’’ सिद्धांत को चुनौती देने जैसा है, वह सिद्धांत जिसे अमेरिका तक 1979 में औपचारिक मान्यता दे चुका है। यही कारण है कि बीजिंग का सुर अचानक आक्रामक होता दिखाई दे रहा है।

चीनी मीडिया और अधिकारियों के बयानों में अब खुली धमकियों की झलक साफ देखी जा सकती है। चीन ने चेतावनी दी है कि ताइवान को चीन से अलग मानने वालों के लिए राजनीतिक या आर्थिक दंड ही नहीं, बल्कि सैन्य कार्रवाई भी संभव है। राज्य मीडिया की रिपोर्टों में यहां तक कहा गया कि जापान को ‘‘72 बमों से खत्म किया जा सकता है’’। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार चीन ने अपनी रॉकेट फोर्स और इंटरमीडिएट-रेंज मिसाइलों को पहले ही सक्रिय कर दिया है, जो 200 किलोटन क्षमता वाले वॉरहेड ले जाने में सक्षम हैं।

जापान की ओर से ताइवान पर दिए गए बयान चीन को उस दहलीज तक ले आए हैं जहां से अब हर प्रतिक्रिया सीधे एशियाई शक्ति संतुलन को बदल सकती है। चीन यह मानता है कि 1945 की सहमतियों पर सवाल खड़ा कर जापान उस ऐतिहासिक संरचना को कमजोर कर रहा है जिसने आठ दशक तक क्षेत्र में शांति बनाए रखी।

इस पृष्ठभूमि में दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका और चीन के बीच कोई नई समझ विकसित हो रही है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने कभी सोवियत प्रभाव को संतुलित करने के लिए ही वन-चाइना नीति स्वीकार की थी और ताइवान से अपने राजनयिक संबंध तोड़े थे। आज वही नीति अंतरराष्ट्रीय स्थिरता की रीढ़ मानी जा रही है।

वर्तमान परिस्थिति में ताइवान विवाद सिर्फ एक द्वीप की राजनीति भर नहीं, बल्कि वैश्विक शांति व्यवस्था की परीक्षा बन चुका है। यदि इस मसले पर सैन्य संघर्ष भड़कता है, तो यह न सिर्फ इतिहास को बदल देगा, बल्कि आने वाले दशकों की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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