चार्ल्स डार्विन की 144वीं पुण्यतिथि: जानें क्यों आज भी डार्विन के सिद्धांत हैं विज्ञान की बड़ी कसौटी?
चार्ल्स डार्विन की 144वीं पुण्यतिथि 2026 में मनाई जा रही है। प्राकृतिक चयन और विकासवाद के सिद्धांत के जनक डार्विन के जीवन, HMS बीगल यात्रा, प्रमुख कृतियों और वेस्टमिंस्टर एब्बे में उनके अंतिम संस्कार की ऐतिहासिक जानकारी इस लेख में विस्तार से प्रस्तुत की गई है।

प्रसिद्ध प्राकृतिक वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन
19 अप्रैल 2026 को विश्व विज्ञान जगत उस महान प्राकृतिक वैज्ञानिक चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन को उनकी 144वीं पुण्यतिथि पर स्मरण कर रहा है, जिन्होंने जीवों के विकास और प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के माध्यम से आधुनिक जैविक विज्ञान की दिशा और समझ को पूरी तरह बदल दिया। डार्विन केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि मानव इतिहास के उन चुनिंदा विचारकों में से थे, जिनकी खोजों ने पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और विविधता को देखने का दृष्टिकोण स्थायी रूप से परिवर्तित कर दिया।
चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के श्रूज़बरी स्थित उनके पारिवारिक निवास ‘द माउंट’ में हुआ था। वे एक संपन्न परिवार से संबंध रखते थे, उनके पिता रॉबर्ट डार्विन एक चिकित्सक और वित्तीय सलाहकार थे, जबकि उनके दादा इरास्मस डार्विन और जोसाया वेजवुड भी अपने समय के प्रसिद्ध सुधारवादी विचारकों में शामिल थे। बचपन से ही डार्विन में प्रकृति के प्रति गहरी रुचि दिखाई देने लगी थी, जिसने उनके भविष्य की वैज्ञानिक यात्रा की नींव रखी।
प्रारंभिक शिक्षा के दौरान डार्विन ने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में चिकित्सा अध्ययन शुरू किया, लेकिन शल्य चिकित्सा में रुचि न होने के कारण उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के क्राइस्ट कॉलेज पहुंचे, जहां उनके विचारों को नई दिशा मिली। यहीं पर उनका झुकाव प्राकृतिक इतिहास और वैज्ञानिक अध्ययन की ओर गहराता गया।
डार्विन के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ 1831 से 1836 के बीच HMS बीगल जहाज पर की गई उनकी पाँच वर्षीय समुद्री यात्रा थी। इस यात्रा ने उन्हें दक्षिण अमेरिका, गैलापागोस द्वीप समूह और अन्य क्षेत्रों की जैव विविधता का गहन अध्ययन करने का अवसर दिया। इन्हीं अवलोकनों के आधार पर उन्होंने धीरे-धीरे प्राकृतिक चयन के सिद्धांत की रूपरेखा तैयार की, जिसने आगे चलकर जीवों के विकास के वैज्ञानिक सिद्धांत को जन्म दिया।
वर्ष 1858 में चार्ल्स डार्विन और अल्फ्रेड रसेल वालेस ने संयुक्त रूप से अपने सिद्धांतों को वैज्ञानिक समाज के समक्ष प्रस्तुत किया, जिसके बाद 1859 में डार्विन की ऐतिहासिक पुस्तक “ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़” प्रकाशित हुई। इस पुस्तक ने विज्ञान की दुनिया में क्रांति ला दी और जीवों के विकास को समझने की एक नई वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान की। इसके बाद उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में “द डिसेंट ऑफ मैन”, “फर्टिलाइजेशन ऑफ ऑर्किड्स” और “द एक्सप्रेशन ऑफ द इमोशन्स इन मैन एंड एनिमल्स” शामिल हैं, जिन्होंने जीवविज्ञान के साथ-साथ मनोविज्ञान और मानव विकास की समझ को भी समृद्ध किया।
19वीं सदी के अंत तक डार्विन के सिद्धांतों को व्यापक वैज्ञानिक स्वीकृति मिल चुकी थी और आगे चलकर 20वीं सदी में आधुनिक विकासवादी संश्लेषण ने उनके विचारों को और अधिक मजबूत आधार प्रदान किया। उन्हें जीवन विज्ञान की एकीकृत व्याख्या देने वाले सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में गिना जाता है।
डार्विन का निधन 19 अप्रैल 1882 को डाउन हाउस में हुआ। बाद में वैज्ञानिक समुदाय और सार्वजनिक सम्मान के चलते उन्हें वेस्टमिंस्टर एब्बे में दफनाया गया, जहां वे आइजैक न्यूटन और जॉन हर्शल जैसे महान वैज्ञानिकों के साथ विश्राम कर रहे हैं। उनका अंतिम संस्कार हजारों लोगों की उपस्थिति में एक ऐतिहासिक घटना बन गया था।
चार्ल्स डार्विन की वैज्ञानिक विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी। उनके विचारों ने न केवल जीवविज्ञान बल्कि संपूर्ण वैज्ञानिक चिंतन को नई दिशा दी और मानव सभ्यता को स्वयं को समझने का एक गहरा माध्यम प्रदान किया।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
