ईरान में कोहराम: मौत का आंकड़ा 500 के पार, इंटरनेट के अंधेरे में दबी लोकतंत्र की चीखक्या यह इस्लामी हुकूमत के अंत का आगाज़ है?
ईरान में महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब खूनी संघर्ष में बदल गया है। 538 से अधिक मौतों और राष्ट्रव्यापी इंटरनेट ब्लैकआउट के बीच ईरान की स्थिति तनावपूर्ण है। राष्ट्रपति पेजेशकियन और ट्रंप के बयानों ने अंतरराष्ट्रीय सरगर्मी बढ़ा दी है। पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।

Chaos in Iran: Death toll crosses 500, cries of democracy buried in the darkness of the internet
तेहरान/दुबई: ईरान के आसमान में आज केवल बारूद का धुआं और खामोशी का सन्नाटा पसरा है। पिछले दो हफ्तों से महंगाई और आर्थिक बदहाली के खिलाफ शुरू हुआ जन-आक्रोश अब एक खूनी क्रांति का रूप ले चुका है। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा बलों की बर्बर कार्रवाई में अब तक मरने वालों की संख्या 538 के पार पहुंच गई है। सरकार द्वारा लगाए गए राष्ट्रव्यापी 'इंटरनेट ब्लैकआउट' ने देश को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया है, जिससे यह आशंका गहरा गई है कि संचार के अभाव में सुरक्षा बल किसी बड़े नरसंहार को अंजाम दे रहे हैं।
विरोध की यह आग दिसंबर के अंतिम सप्ताह में रियाल की गिरती कीमत और आसमान छूती कीमतों के विरोध में भड़की थी, लेकिन अब यह सीधे तौर पर देश की धार्मिक सत्ता को चुनौती दे रही है। अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी (HRANA) के आंकड़ों के मुताबिक, मारे गए लोगों में 490 आम प्रदर्शनकारी और 48 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। तेहरान के काहरिज़ाक फोरेंसिक सेंटर से लीक हुए वीडियो और चश्मदीदों के दावे रूह कंपा देने वाले हैं, जहाँ शवों के अंबार लगे होने की बात कही जा रही है।
ईरानी प्रशासन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए दमनकारी नीतियों की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। नेटब्लॉक्स (NetBlocks) ने पुष्टि की है कि समूचे ईरान में इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह ठप हैं। इस डिजिटल अंधेरे के बीच रेजा पहलवी, जो ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस हैं, ने सुरक्षा बलों से अपील की है कि वे अपनी ही जनता पर गोलियां चलाने के बजाय उनके साथ खड़े हों। वहीं दूसरी ओर, कट्टरपंथी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर कलीबाफ ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका या इजरायल ने हस्तक्षेप किया, तो उनके सैन्य ठिकाने ईरान के सीधे निशाने पर होंगे।
आधिकारिक पक्ष रखते हुए राष्ट्रपति मसौद पेजेशकियन ने इन प्रदर्शनों को विदेशी साजिश करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि "सशस्त्र आतंकवादी" मस्जिदों और सार्वजनिक संपत्तियों को निशाना बना रहे हैं। सुरक्षा परिषद के शीर्ष अधिकारी अली लारीजानी ने भी प्रदर्शनकारियों की तुलना आईएसआईएस (ISIS) से करते हुए सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। इस बीच, एम्नेस्टी इंटरनेशनल ने इलम के इमाम खुमैनी अस्पताल जैसे चिकित्सा संस्थानों पर सुरक्षा बलों के हमलों की निंदा की है, जहाँ घायलों का इलाज कर रहे डॉक्टरों और कर्मियों के साथ मारपीट की खबरें आई हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा कि "ईरान आजादी की ओर देख रहा है और अमेरिका मदद के लिए तैयार है।" दूसरी ओर, वेटिकन से पोप लियो XIV ने हिंसा पर दुख व्यक्त करते हुए शांति की अपील की है। फिलहाल, तेहरान और मशहद जैसे बड़े शहरों में रात के अंधेरे में भी गोलियों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। यह घटनाक्रम केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि ईरान के राजनीतिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, जिसकी कीमत वहां की जनता अपने खून से चुका रही है।

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