वॉशिंगटन/जेनेवा। वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास में आज का दिन एक ऐसे भूचाल के रूप में दर्ज किया गया है, जिसकी गूँज दशकों तक सुनाई देगी। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति, संयुक्त राज्य अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ अपने करीब आठ दशक पुराने संबंधों को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया है। 22 जनवरी, 2026 को पूरी हुई इस विदाई प्रक्रिया के साथ ही जेनेवा स्थित WHO मुख्यालय के बाहर से अमेरिकी ध्वज को उतार दिया गया है। यह कदम न केवल वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के ढांचे को हिला देने वाला है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के चरमोत्कर्ष को भी दर्शाता है।

विवाद की जड़: 'ब्यूरोक्रेटिक नाकामी' और 'चीन' का साया

ट्रम्प प्रशासन ने इस ऐतिहासिक विदाई के पीछे WHO की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और स्वास्थ्य सचिव रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर द्वारा जारी संयुक्त बयान में इस निर्णय को 'अमेरिकी हितों की रक्षा' बताया गया है।

  • मिशैंडलिंग का आरोप: अमेरिका का दावा है कि COVID-19 महामारी के शुरुआती दौर में WHO ने वुहान (चीन) से उत्पन्न खतरे को भांपने में जानबूझकर देरी की, जिससे लाखों अमेरिकियों की जान गई।
  • अक्षम नौकरशाही: वॉशिंगटन ने WHO को एक 'फूला हुआ और अक्षम' सरकारी तंत्र करार दिया है, जो सुधारों को अपनाने में पूरी तरह विफल रहा है।
  • राजनीतिक प्रभाव: आरोप लगाया गया है कि संगठन स्वतंत्र रूप से कार्य करने के बजाय कुछ विशेष देशों के राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है, जिससे इसकी निष्पक्षता खत्म हो गई है।

बकाया राशि और कानूनी पेंच: अधूरा है यह 'तलाक'?

हालांकि अमेरिका ने तकनीकी रूप से अपनी सदस्यता समाप्त कर ली है, लेकिन WHO ने इसे 'कानूनी रूप से अधूरा' करार दिया है। संगठन के नियमों और 1948 के संसदीय प्रस्ताव के अनुसार, किसी भी सदस्य देश को विदा होने के लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं: एक साल का नोटिस और सभी वित्तीय बकाये का भुगतान।

  • वित्तीय संकट: WHO के अनुसार, अमेरिका पर अभी भी करीब 260 मिलियन डॉलर (लगभग ₹2100 करोड़) से अधिक की सदस्यता फीस बकाया है।
  • फंडिंग पर रोक: व्हाइट हाउस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह विदाई से पहले कोई भुगतान नहीं करेगा, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर वित्तीय संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
  • विशेषज्ञों की वापसी: WHO में कार्यरत सभी अमेरिकी विशेषज्ञों और ठेकेदारों को तत्काल प्रभाव से वापस बुला लिया गया है।

वैश्विक स्वास्थ्य पर प्रभाव: क्या असुरक्षित होगी दुनिया?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस फैसले को 'वैज्ञानिक रूप से आत्मघाती' बताया है। अमेरिका WHO का सबसे बड़ा डोनर रहा है, जो इसके कुल बजट का लगभग 20% हिस्सा वहन करता था।

  • टीकाकरण और शोध: पोलियो उन्मूलन, एड्स और मलेरिया जैसी बीमारियों के खिलाफ चल रहे वैश्विक अभियानों को बड़ा धक्का लग सकता है।
  • डाटा एक्सेस का नुकसान: अब अमेरिका को भविष्य की महामारियों या फ्लू वायरस के स्ट्रेन से जुड़ी वैश्विक जानकारी समय पर नहीं मिल पाएगी, जो वैक्सीन निर्माण के लिए अनिवार्य है।
  • चीन का बढ़ता वर्चस्व: विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की अनुपस्थिति में WHO के भीतर चीन और अन्य देशों का प्रभाव बढ़ेगा।

एक अनिश्चित भविष्य की ओर

अमेरिका का WHO से बाहर निकलना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व से पीछे हटने का संकेत है। जहाँ एक ओर अमेरिका अब सीधे तौर पर देशों के साथ 'द्विपक्षीय' स्वास्थ्य समझौतों पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी ओर दुनिया को डर है कि किसी नई महामारी की स्थिति में वैश्विक समन्वय का अभाव तबाही मचा सकता है। यह देखना बाकी है कि क्या वॉशिंगटन की यह 'अकेले चलने की जिद' उसे सुरक्षित रख पाएगी या यह वैश्विक स्वास्थ्य के पतन की शुरुआत साबित होगी।

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