Pakistan role in US-Iran ceasefire 2026 : पश्चिम एशिया में बारूद की गंध के बीच अचानक आई सीजफायर की खबर ने वैश्विक भू-राजनीति के समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व के बीच हुए इस ऐतिहासिक समझौते में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर इस वक्त सबसे अधिक चर्चा हो रही है। जहां एक ओर ट्रंप ने अपने आधिकारिक संदेश में इस्लामाबाद का विशेष उल्लेख किया, वहीं दूसरी ओर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का आभार व्यक्त किया। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी यह सवाल खड़ी करती है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में इस शांति प्रक्रिया का सूत्रधार था या उसकी भूमिका केवल एक 'पोस्टमैन' तक सीमित रही।

इस युद्धविराम की पटकथा सोमवार, 6 अप्रैल 2026 को तब शुरू हुई जब ईरान ने एक 10-सूत्रीय शांति प्रस्ताव वाशिंगटन भेजा। व्हाइट हाउस के सूत्रों और अमेरिकी मीडिया आउटलेट 'एक्सियोस' की रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ इस प्रस्ताव की शर्तों से संतुष्ट नहीं थे और वार्ता टूटने की कगार पर थी। संकट को गहराते देख अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बीजिंग से संपर्क साधा। चीन के हस्तक्षेप और ईरान पर डाले गए कूटनीतिक दबाव के बाद इस प्रस्ताव में संशोधन किया गया। नए समझौते के तहत यह तय हुआ कि अमेरिका अपनी बमबारी रोकेगा और बदले में ईरान सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोल देगा।

इस पूरी कूटनीतिक उठापटक में पाकिस्तान का प्रवेश तब हुआ जब ड्राफ्ट तैयार हो चुका था। तकनीकी रूप से पाकिस्तान ने न तो इस प्रस्ताव को तैयार करने में कोई योगदान दिया और न ही इसकी शर्तों में कोई बदलाव करवाया। जब तेहरान और वाशिंगटन के बीच चीन के माध्यम से सहमति बन गई, तब संदेशों के आदान-प्रदान के लिए एक भरोसेमंद माध्यम के रूप में पाकिस्तान का उपयोग किया गया। एक्सियोस के अनुसार, ईरान के सुप्रीम लीडर की अंतिम मंजूरी का संदेश पाकिस्तान के जरिए ही ट्रंप तक पहुँचा, जिसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा की।



विशेषज्ञों का विश्लेषण इस भूमिका के पीछे अलग ही कहानी बयां करता है। अमेरिकी पॉलिसी एक्सपर्ट एडम कॉचरान का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ अपने हितों को साधने के लिए पाकिस्तान का रणनीतिक रूप से 'इस्तेमाल' किया है। वहीं, मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार कबीर तनेजा का तर्क है कि पाकिस्तान अपनी चरमराती आर्थिक स्थिति के कारण इस तरह की भूमिका निभाने के लिए व्याकुल था। इस्लामाबाद की मंशा इस संकट के जरिए अमेरिका के साथ अपने पुराने संबंधों को पुनर्जीवित करने और खाड़ी देशों की राजनीति में दोबारा पैठ बनाने की है।

अंततः, यह सीजफायर भले ही दो सप्ताह के लिए हो, लेकिन इसने पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर दोबारा चर्चा में ला दिया है। भले ही उसकी भूमिका केवल एक मध्यस्थ संदेशवाहक की रही हो, लेकिन युद्ध की विभीषिका के बीच वाशिंगटन और तेहरान के बीच सेतु बनना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा संकेत है। अब देखना यह होगा कि क्या यह 'संदेशवाहक' की भूमिका पाकिस्तान के लिए भविष्य में कोई बड़ा आर्थिक या रणनीतिक लाभ लेकर आती है या यह केवल एक तात्कालिक कूटनीतिक प्रबंध बनकर रह जाता है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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