मध्य-पूर्व का महत्वपूर्ण राष्ट्र ईरान इस वक्त बारूद के ढेर पर खड़ा है। एक ओर जहां अयातुल्ला अली खामेनेई की सरकार को पिछले 47 वर्षों के सबसे भीषण जन-विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ बढ़ते सैन्य तनाव ने क्षेत्र में अस्थिरता का नया अध्याय लिख दिया है। 28 दिसंबर से भड़की यह आग अब केवल ईरान की सीमाओं तक सीमित नहीं है; इसकी तपिश नई दिल्ली के गलियारों में भी महसूस की जा रही है। भारत के लिए यह महज एक कूटनीतिक संकट नहीं, बल्कि अरबों डॉलर के निवेश और रणनीतिक स्वायत्तता पर मंडराता बड़ा खतरा है।

ईरान में अशांति की जड़: गिरता रियाल और बढ़ती महंगाई

ईरान में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत आर्थिक बदहाली से हुई है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ईरानी मुद्रा 'रियाल' के ऐतिहासिक पतन और आसमान छूती महंगाई ने आम जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। सरकार विरोधी यह लहर इतनी व्यापक है कि इसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे बड़ा आंतरिक संकट माना जा रहा है। अमेरिका द्वारा सैन्य हस्तक्षेप की धमकियों ने इस आग में घी डालने का काम किया है।

भारत के लिए दांव पर क्या है?

भारत और ईरान के संबंध केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं हैं। भारत ने मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक अपनी सीधी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ईरान की धरती पर भारी निवेश किया है।

  • चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port): यह भारत की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना है। दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित इस बंदरगाह के जरिए भारत, पाकिस्तान को बाईपास करते हुए सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचता है। ईरान में अस्थिरता का अर्थ है—चाबहार के संचालन में बाधा।
  • INSTC कॉरिडोर: अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) लगभग 7,000 किलोमीटर लंबा एक नेटवर्क है। यह स्वेज नहर के मुकाबले छोटा और सस्ता मार्ग है, जो भारत को रूस और यूरोप से जोड़ता है। चाबहार इस गलियारे का प्रवेश द्वार है।
  • द्विपक्षीय व्यापार: वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार 1.68 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जिसमें भारत का पलड़ा भारी है (1.24 बिलियन डॉलर का निर्यात)।

रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियां :

ईरान में बढ़ता तनाव भारत के लिए 'दोहरी मार' साबित हो सकता है:

  • निवेश का जोखिम: चाबहार पोर्ट पर खर्च किए गए लाखों डॉलर का भविष्य अधर में लटक सकता है।
  • निर्यात पर असर: यदि बंदरगाह की गतिविधियां बाधित होती हैं, तो भारत के कृषि और औद्योगिक निर्यात को भारी नुकसान होगा।
  • ऊर्जा सुरक्षा: खाड़ी क्षेत्र में युद्ध की स्थिति वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता पैदा करेगी, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा।
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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