पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बगदा गांव में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने न केवल गांव को हिलाकर रख दिया, बल्कि चुनाव आयोग के SIR (Special Intensive Revision) अभियान को अप्रत्याशित तरीके से सुर्खियों में ला दिया। जिस व्यक्ति को परिवार ने लगभग तीन दशक पहले मृत मान लिया था, उसका श्राद्ध कर दिया था और विधवा पत्नी ने नियति मानकर जीवन को आगे बढ़ा दिया था, वही जगबंदू मंडल अचानक 28 साल बाद घर के दरवाज़े पर खड़ा मिला। यह घटना ऐसी है जिसने न सिर्फ एक टूटे हुए परिवार को फिर से जोड़ा, बल्कि मतदाता सूची की भूमिका पर भी नए सवाल खड़े कर दिए।

फरवरी 1997 की एक सर्द सुबह 55 वर्षीय जगबंदू मंडल बिना कुछ बताए घर से निकल गया था और फिर कभी लौटकर नहीं आया। लंबे समय तक खोजबीन के बाद भी उसका कोई पता नहीं चल पाया। निराश होकर परिवार ने ज्योतिषियों की सलाह पर उसे मृत मान लिया, श्राद्ध कर दिया और उसकी पत्नी सुप्रिया ने दो बच्चों के साथ विधवा का जीवन स्वीकार कर लिया। वर्षों तक चलती आ रही वेदना धीरे-धीरे दिनचर्या में बदल गई थी।

लेकिन समय ने जैसे अचानक करवट ली। सोमवार की दोपहर दरवाजे पर हुई एक दस्तक ने सुप्रिया की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। दरवाज़ा खोलते ही उसने उस चेहरे को देखा जिसे वह बरसों पहले खा चुकी थी—थोड़ा बदला हुआ, उम्र का बोझ लिए हुए, लेकिन पहचान में आने लायक। उसी आवाज़, उसी चेहरे का भार, और उसी नाम का व्यक्ति उसके सामने खड़ा था—जगबंदू मंडल।

घटना की जानकारी मिलते ही गांव में हलचल मच गई। पिता बिजय मंडल ने तुरंत उसे पहचान लिया। परिवार की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहा, लेकिन उसके लौटने की वजह ने पूरी कहानी को नया मोड़ दे दिया। जगबंदू ने बताया कि छत्तीसगढ़ में काम छूट गया था और वह वापस लौट आया। लेकिन कहानी इतनी सरल नहीं थी, क्योंकि असली वजह मतदाता सूची से उसका नाम कट जाना था। SIR अभियान के दौरान उसे महसूस हुआ कि उसका नाम बगदा की वोटर लिस्ट में नहीं है और आधिकारिक पहचान बहाल करने के लिए उसे घर लौटना ही पड़ेगा।

गांव में तब खुसुर–फुसुर तब शुरू हुई जब पता चला कि बैंकुरा जिले की मतदाता सूची में अभी भी उसका नाम दर्ज है, लेकिन उसके नाम के बगल में ‘सुलेखा मंडल’ नाम की एक महिला भी सूचीबद्ध है। गांव में अफवाह फैली कि शायद उसने दूसरी शादी कर ली हो, लेकिन जगबंदू ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। उसके अनुसार वह गुजरात, मुंबई और बैंकुरा में अस्थायी रूप से रहा, फिर अंत में छत्तीसगढ़ में बस गया, लेकिन विवाह दोबारा नहीं किया।

स्थानीय बूथ कमेटी सदस्य समीर गुहा के अनुसार 2002 के बाद की SIR सूची में जगबंदू का नाम नहीं है। केवल उसके पिता का नाम सूची में दर्ज है। अब वह अपने पुराने दस्तावेजों के आधार पर फिर से मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की कोशिश कर रहा है। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने साफ कहा है कि 28 साल तक कोई आधिकारिक रिकॉर्ड न होने के कारण नाम पुनः जोड़ना आसान नहीं होगा, जांच प्रक्रिया समय लेगी।

चुनाव आयोग के SIR अभियान पर देशभर में मचा बवाल जहां कई राज्यों में नाराज़गी और विरोध का कारण बना हुआ है, वहीं इसी प्रक्रिया ने बगदा गांव में एक महिला के जीवन में अप्रत्याशित खुशी लौटा दी। मतदाता सूची ने ही उस व्यक्ति को घर लौटने पर मजबूर किया, जिसे समाज ने वर्षों पहले मृत घोषित कर दिया था।

इस घटना ने कई अहम सवाल भी खड़े कर दिए हैं—क्या किसी शख्स की पहचान और अस्तित्व का अंतिम प्रमाण एक सरकारी दस्तावेज है? क्या मतदाता सूची से नाम कटना वास्तव में ‘मृत’ होने की आधिकारिक घोषणा जैसा हो गया है? इन सवालों से परे, बगदा गांव में फिलहाल केवल एक ही सच स्पष्ट है—एक परिवार, जो कभी बिखर गया था, अचानक 28 साल बाद फिर से पूरा हो गया है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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