लेखक : श्री पी. के. मिश्रा, पूर्व महाप्रबंधक, एमसीएफ


नई दिल्ली। पश्चिमी समर्पित माल गलियारे (Western Dedicated Freight Corridor) के पूर्ण होने और 8 सितंबर को माननीय प्रधानमंत्री द्वारा इसे राष्ट्र को समर्पित किया जाना भारतीय रेल के परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सरकार ने रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए विद्युतीकरण, नई रेल लाइनों, दोहरीकरण एवं मल्टी-लाइनिंग, स्टेशन पुनर्विकास, आधुनिक ट्रेनों, बेहतर सुरक्षा एवं सिग्नलिंग व्यवस्था तथा देश के सबसे व्यस्त रेल मार्गों पर अतिरिक्त क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी है।


वडोदरा में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने बुनियादी ढांचा निर्माण के व्यापक उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत के बुनियादी ढांचे को इस तरह मजबूत किया जा रहा है, जिससे लोगों और माल की तेज आवाजाही हो, नए अवसर पैदा हों और आर्थिक विकास को गति मिले।


पश्चिमी डीएफसी के पूरा होने के साथ देश के दो प्रमुख समर्पित माल गलियारे—1,337 किलोमीटर लंबा पूर्वी डीएफसी और 1,506 किलोमीटर लंबा पश्चिमी डीएफसी—अब लगभग 2,843 किलोमीटर के समर्पित माल नेटवर्क के रूप में सामने आए हैं। इसका महत्व केवल माल ढुलाई तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे मालगाड़ियां समर्पित गलियारों पर स्थानांतरित होंगी, पारंपरिक रेल नेटवर्क पर यात्री ट्रेनों के लिए महत्वपूर्ण पथ उपलब्ध होंगे। साथ ही बंदरगाहों, औद्योगिक केंद्रों, खदानों, उत्पादन केंद्रों और बाजारों को तेज एवं अधिक भरोसेमंद माल परिवहन सुविधा मिलेगी।


यह उपलब्धि हमें भविष्य की ओर देखने का अवसर देती है। सवाल यह है कि 2050 और 2075 के भारत के लिए किस प्रकार के रेलवे नेटवर्क की आवश्यकता होगी?


मांग आने से पहले तैयार करनी होगी रेल क्षमता

रेलवे की योजना केवल उस समय नहीं बनाई जा सकती, जब मांग सामने आ जाए। आज बनाया गया कोई रेल मार्ग अगले 100 वर्षों या उससे भी अधिक समय तक देश की सेवा कर सकता है। भारतीय रेल के कई व्यस्त मार्ग आज भी उन रास्तों पर चलते हैं, जिनका सर्वेक्षण और निर्माण 150 वर्ष से भी पहले किया गया था।


जब भारत ने भविष्य को ध्यान में रखकर रेलवे बनाया

भारतीय रेलवे के इतिहास में भविष्य के लिए दूरदर्शी योजना का एक उल्लेखनीय उदाहरण मिलता है। वर्ष 1853 में मुंबई से ठाणे के बीच पहली यात्री ट्रेन महज 21 मील चली थी। लेकिन अगले 40 वर्षों में रेलवे नेटवर्क लगभग 18,500 मील तक पहुंच गया। यानी चार दशकों तक औसतन लगभग 460 मील अथवा 740 किलोमीटर प्रति वर्ष नेटवर्क का भौगोलिक विस्तार हुआ।


आजादी के बाद की स्थिति से तुलना करें तो वर्ष 1950-51 में भारतीय रेल का नेटवर्क 53,596 रूट किलोमीटर था, जो आज लगभग 69,000 किलोमीटर है। यानी औसतन करीब 214 रूट किलोमीटर प्रतिवर्ष का विस्तार हुआ। हालांकि दोनों कालखंडों की सीधी तुलना उचित नहीं होगी, क्योंकि स्वतंत्र भारत ने गेज परिवर्तन, विद्युतीकरण, दोहरीकरण, मल्टी-लाइनिंग, मजबूत ट्रैक, आधुनिक सिग्नलिंग और क्षमता विस्तार जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश किया है।


फिर भी इतिहास हमें यह संदेश देता है कि तेजी से बढ़ते भारत के लिए रेलवे नेटवर्क के विस्तार के बारे में फिर उसी स्तर की दूरदृष्टि की आवश्यकता है।


रेलवे के विकास के साथ भूमि और कानूनी व्यवस्था में भी बदलाव किए गए थे। 1850 में सरकार द्वारा स्वीकृत रेलवे परियोजनाओं को सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण के ढांचे में लाने की व्यवस्था की गई। इसके बाद बंबई और मद्रास में भी रेलवे भूमि से जुड़े प्रावधान किए गए और 1857 में अधिक व्यापक भूमि अधिग्रहण व्यवस्था सामने आई। आज भारत में भूमि अधिग्रहण के लिए पूरी तरह अलग और अधिक मजबूत कानूनी सुरक्षा व्यवस्था है, लेकिन मूल सीख आज भी प्रासंगिक है—भविष्य के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करते समय भूमि नीति और संस्थागत व्यवस्था को साथ लेकर चलना होगा।


सड़कों ने दिखाई विकास की संभावनाएं

आजादी के बाद भारत ने सड़क नेटवर्क के विस्तार के माध्यम से भी बुनियादी ढांचे की क्षमता का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्ष 1951 में लगभग 4 लाख किलोमीटर का सड़क नेटवर्क आज बढ़कर करीब 63.73 लाख किलोमीटर हो गया है।


राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क भी वर्ष 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर मार्च 2026 तक लगभग 1,46,572 किलोमीटर हो गया है। इसके साथ चार लेन वाले राजमार्गों, एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर और एक्सप्रेसवे का भी तेजी से विस्तार हुआ है।


इस परिवर्तन ने गांवों को बाजारों, शहरों को उनके आसपास के क्षेत्रों और औद्योगिक केंद्रों को बंदरगाहों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका अर्थ रेल और सड़क में किसी एक को चुनना नहीं है। बल्कि सड़क नेटवर्क का विस्तार यह दर्शाता है कि जब आर्थिक और सामाजिक मांग का अनुमान लगाकर लगातार क्षमता तैयार की जाती है, तो बुनियादी ढांचे का विस्तार कितने बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।


विकास के भूगोल के अनुसार बने रेल मार्ग

भारत का आर्थिक भूगोल तेजी से बड़े शहरी एवं औद्योगिक केंद्रों के आसपास केंद्रित हो रहा है। देश के 47 मिलियन से अधिक आबादी वाले शहर लगभग 60 प्रतिशत जीडीपी में योगदान देते हैं। ऐसे आर्थिक केंद्रों को तेज, लगातार और किफायती रेल सेवा से जोड़ना केवल यात्री सुविधा का विषय नहीं, बल्कि देश के आर्थिक बुनियादी ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


भविष्य की रेलवे योजना में दो प्रमुख प्रवाहों—लोगों और सामग्री—को ध्यान में रखना होगा।


रोजगार बढ़ने के साथ लाखों श्रमिक अपने गृह क्षेत्रों से उन शहरों की ओर जाते रहेंगे, जहां रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। उनके लिए रेलवे की क्षमता का अर्थ केवल तेज गति नहीं, बल्कि पर्याप्त, भरोसेमंद और किफायती यात्रा भी है।


दूसरी ओर, तेजी से बढ़ते शहरों और उद्योगों को कोयला, लौह अयस्क, इस्पात, सीमेंट, खाद्यान्न, ऑटोमोबाइल, कंटेनर और अनेक अन्य वस्तुओं की लगातार आवश्यकता होगी। इन्हें खदानों, खेतों, कारखानों और बंदरगाहों से देशभर में पहुंचाना होगा।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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