वाराणसी में 'नेपथ्य के रंग' कला प्रदर्शनी 20 अक्टूबर से
श्री बंशीधर प्रतिहारी और सुश्री आशिमा मेहरोत्रा की यह सामूहिक कला प्रदर्शनी 20 से 26 अक्टूबर 2026 तक मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में आयोजित की जाएगी।

वाराणसी की पहचान केवल उसके घाटों, स्थापत्य और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। शहर की स्मृतियों, भावनाओं, आध्यात्मिक ऊर्जाओं और कालातीत अनुभूतियों को कलात्मक अभिव्यक्ति देने वाली सामूहिक कला प्रदर्शनी ‘नेपथ्य के रंग’ 20 अक्टूबर 2026 से मुंबई में दर्शकों के सामने होगी। श्री बंशीधर प्रतिहारी और सुश्री आशिमा मेहरोत्रा की कलाकृतियों के माध्यम से यह प्रदर्शनी दृश्य दुनिया से परे वाराणसी के उन आयामों की पड़ताल करेगी, जो सामान्यतः प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते।
प्रदर्शनी का उद्घाटन 20 अक्टूबर 2026 को शाम 5:00 बजे जहांगीर आर्ट गैलरी, गैलरी नंबर 02, महात्मा गांधी रोड, कालाघोड़ा, फोर्ट, मुंबई में होगा। उद्घाटन समारोह में सायम्रोज़ा आर्ट गैलरी की संस्थापक एवं निदेशक सुश्री फिरोजा गोदरेज मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगी। कोंकण रेलवे के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (CMD) श्री संतोष कुमार झा तथा बॉम्बे आर्ट सोसाइटी के अध्यक्ष श्री राजेंद्र पाटिल विशिष्ट अतिथि होंगे। प्रदर्शनी 20 से 26 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन सुबह 11:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक आम जनता के अवलोकन के लिए खुली रहेगी।
‘नेपथ्य के रंग’ में वाराणसी की स्थापत्य भव्यता और अनुष्ठानों की आभा से आगे बढ़कर उन अदृश्य भावनाओं, स्मृतियों, ऊर्जाओं और आध्यात्मिक अनुभूतियों को अभिव्यक्त किया गया है, जो शहर की पहचान को आकार देती हैं। जिस प्रकार रंगमंच का अस्तित्व पर्दे के पीछे होने वाले अदृश्य प्रयासों पर निर्भर करता है, उसी प्रकार वाराणसी का कालातीत सार भी उन शक्तियों से निर्मित होता है, जो भौतिक जगत से परे हैं।
प्रदर्शनी वाराणसी को अनंतता के जीवंत रूपक के रूप में प्रस्तुत करती है। यहां जीवन और मृत्यु एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि शाश्वत चक्र की पूरक गतियां हैं। भोर धीरे-धीरे संध्या में विलीन हो जाती है, पवित्रता सामान्य जीवन में घुल-मिल जाती है और व्यक्ति अनंतता के भीतर सामंजस्य खोज लेता है।
प्रदर्शनी में शामिल चित्र शहर के भौतिक परिदृश्य की हूबहू प्रतिकृति प्रस्तुत करने के बजाय अमूर्त रूपों, प्रकाशमान बनावटों, प्रवाहमय आकृतियों और प्रतीकात्मक रंगों के जरिए वाराणसी की आंतरिक संवेदनाओं को सामने लाते हैं। प्रत्येक कैनवास दर्शकों को केवल देखने के बजाय चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है। वाराणसी के माध्यम से यह प्रदर्शनी दर्शकों को अपनी स्मृतियों और आध्यात्मिक अनुभूतियों की तलाश करने का अवसर देती है। इसमें दृश्य और अदृश्य, साकार और निराकार तथा उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच के संबंध को अभिव्यक्त किया गया है। इसका केंद्रीय भाव वाराणसी को ऐसी शाश्वत चेतना के रूप में देखना है, जहां प्रत्येक दृश्य रूप अनंतता से उत्पन्न होकर अंततः उसी में विलीन हो जाता है।
श्री बंशीधर प्रतिहारी की कला यात्रा कला भवन की विरासत से जुड़ी है। वर्ष 1928 में जन्मे प्रतिहारी प्रतिष्ठित कलाकार हैं और सुश्री आशिमा मेहरोत्रा की कलात्मक यात्रा पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। वे विश्वभारती विश्वविद्यालय के कला भवन के विशिष्ट पूर्व छात्र हैं। उन्होंने वर्ष 1952 से 1958 तक वहां छह वर्षों का गहन कलात्मक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
प्रतिहारी ने अपनी कला और गुरु के प्रति एकलव्य जैसी निष्ठा के साथ प्रख्यात कलाकार एवं शिक्षाविद् नंदलाल बोस की असाधारण रेखांकन क्षमता और सौंदर्यबोध को आत्मसात किया। कला भवन में उनके शिक्षकों और सहपाठियों ने उन्हें बोस की विशिष्ट कलाशैली का वास्तविक उत्तराधिकारी माना।
उल्लेखनीय कलात्मक उपलब्धियों के बावजूद प्रतिहारी काफी हद तक सुर्खियों से दूर रहे हैं। उनकी कला से परिचित लोग उनके कार्यों को विशेष रूप से संजोकर रखते हैं। उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रपति स्वर्ण पदक के साथ-साथ राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी बाटिक चित्रकला ‘दुर्गा’ तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह को भी भेंट की गई थी।
वर्ष 2023 में ओडिशा सरकार के तत्वावधान में ओडिशा ललित कला अकादमी ने ललित कलाओं में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें धर्मपद पुरस्कार से सम्मानित किया। यह ओडिशा के कलाकारों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। उनकी कलात्मक यात्रा और विरासत को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) द्वारा हाल ही में लोकार्पित एक पुस्तक में भी दस्तावेजीकृत किया गया है।
‘नेपथ्य के रंग’ में प्रतिहारी भारतीय सांस्कृतिक अनुभवों में निहित परिपक्व और गहन चिंतनशील कलात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। कला भवन की परंपरा और नंदलाल बोस की विरासत से उनका जुड़ाव कलात्मक परंपरा, सांस्कृतिक स्मृति और समकालीन अभिव्यक्ति के बीच महत्वपूर्ण सेतु स्थापित करता है।
सुश्री आशिमा मेहरोत्रा प्रदर्शनी में इस स्थापित कलात्मक दृष्टिकोण के साथ समकालीन और व्यक्तिगत व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) की वरिष्ठ अधिकारी मेहरोत्रा ने मुख्यतः स्व-अध्ययन के माध्यम से अपनी कला विकसित की है। उनकी विशिष्ट दृश्य भाषा पर आध्यात्मिकता, प्रकृति, सांस्कृतिक स्मृतियों, यात्राओं और मानवीय भावनाओं की जटिलताओं का प्रभाव दिखाई देता है।
उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति अमूर्त कला, प्रतीकात्मकता, आकृतिमूलक अभिव्यक्ति और मिश्रित माध्यमों के बीच सहजता से आगे बढ़ती है। उनकी कला में रंग और बनावट उन अनुभवों को व्यक्त करने का माध्यम बनते हैं, जो तत्काल दिखाई देने वाली दुनिया से परे हैं।
श्री वीर मुंशी और श्री बंशीधर प्रतिहारी के मार्गदर्शन तथा क्लोद मोने और अमृता शेरगिल जैसे महान कलाकारों से प्रेरणा लेकर मेहरोत्रा ने पिछले छह वर्षों में अपनी विशिष्ट कलात्मक शब्दावली विकसित की है। उनकी कलात्मक यात्रा की शुरुआत वर्ष 2019 में मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में आयोजित पहली एकल प्रदर्शनी से हुई। इसके बाद भारत और विदेशों में आयोजित 13 से अधिक एकल प्रदर्शनियों तथा 72 से अधिक सामूहिक प्रदर्शनियों तक उनकी कला यात्रा का विस्तार हुआ।
उनकी कलाकृतियां AIFACS, GMR, ललित कला अकादमी, बॉम्बे आर्ट सोसाइटी और चितरामयी स्टेट गैलरी ऑफ आर्ट सहित विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर प्रदर्शित की गई हैं। उनकी कलात्मक यात्रा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। इनमें भारत सरकार की ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित 64वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी (2024–25) के लिए उनका चयन और अमृतसर की इंडियन एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स की 89वीं वार्षिक अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी में उनकी भागीदारी शामिल है।
मेहरोत्रा को बॉम्बे आर्ट सोसाइटी की 134वीं अखिल भारतीय वार्षिक कला प्रदर्शनी में सामाजिक सरोकार पर आधारित सर्वश्रेष्ठ चित्रकला पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने यूरेशिया बुसान इंटरनेशनल आर्ट फेयर 2025 में भारत का प्रतिनिधित्व किया, सेंट पीटर्सबर्ग में ‘प्लेन एयर रशियन अटलांटिस’ में भाग लिया और आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) द्वारा प्रायोजित बीजिंग की एक प्रदर्शनी में अपनी कलाकृतियां प्रस्तुत कीं।
मेहरोत्रा की कला का एक विशिष्ट पहलू एनकॉस्टिक आर्ट के प्रति उनका जुड़ाव है। यह प्राचीन और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण कला माध्यम है, जिसमें गर्म किए गए मधुमक्खी के मोम, प्राकृतिक रेजिन और रंगद्रव्यों का उपयोग किया जाता है। परतों को बनाने, पिघलाने, संरक्षित करने और उजागर करने की प्रक्रिया के जरिए वे ऐसी सतहें तैयार करती हैं, जो स्मृतियों, भावनाओं और जीवन के अनुभवों का रूपक बन जाती हैं। तेल रंगों, ऐक्रेलिक और मिश्रित माध्यमों में उनके कार्य भी दृश्य के भीतर अदृश्य को खोजने की निरंतर प्रक्रिया को दर्शाते हैं।
परतों पर आधारित यह कलात्मक दृष्टिकोण ‘नेपथ्य’ की अवधारणा से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। जिस प्रकार मोम की परतें सतह के नीचे छिपी चीजों को ढकने के साथ उजागर भी करती हैं, उसी प्रकार वाराणसी अपने भीतर इतिहास, स्मृतियों, अनुष्ठानों, आस्थाओं और मानवीय अनुभवों की अनेक परतें समेटे हुए है। इन परतों को केवल आंखों से दिखाई देने वाली चीजों के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
दो अलग-अलग कलात्मक दृष्टिकोणों का संगम ‘नेपथ्य के रंग’ को विशिष्ट पहचान देता है। कला भवन की परंपरा और नंदलाल बोस की विरासत में निहित प्रतिहारी की परिपक्व कलात्मक साधना का संवाद मेहरोत्रा की समकालीन दृश्य कला की खोज से होता है। दोनों की कलात्मक अभिव्यक्तियां अपनी अलग पहचान बनाए रखती हैं और किसी एक शैली में विलीन नहीं होतीं। इसके बजाय, उनकी कलाकृतियां अनुभव और अन्वेषण, परंपरा और समकालीन अभिव्यक्ति तथा स्मृतियों और कल्पनाओं के बीच संवाद स्थापित करती हैं।
प्रदर्शनी वाराणसी के अनदेखे भावनात्मक और आध्यात्मिक आयामों की पड़ताल करते हुए शहर को अनंतता के रूपक के रूप में प्रस्तुत करती है। रंग, स्मृति और चेतना के परस्पर संबंध के माध्यम से यह दर्शकों को दृश्य से परे देखने और सीमित तथा असीम के बीच चलने वाले कालातीत संवाद को अनुभव करने के लिए आमंत्रित करती है।
‘नेपथ्य के रंग’ का अंतिम केंद्रबिंदु दर्शकों को तत्काल दिखाई देने वाली दुनिया से आगे उस अदृश्य संसार की खोज के लिए प्रेरित करना है, जो वाराणसी को उसकी चिरस्थायी पहचान प्रदान करता है। यह यात्रा शहर से चेतना की ओर, भौतिक परिदृश्य से स्मृतियों की ओर और दृश्य से अदृश्य की ओर बढ़ती है। इस प्रक्रिया में वाराणसी केवल कलाकृतियों का विषय नहीं रहता, बल्कि ऐसे दर्पण के रूप में उभरता है, जिसके माध्यम से दर्शक अपनी स्मृतियों, भावनाओं और आध्यात्मिक अनुभूतियों से साक्षात्कार कर सकते हैं।
इस तरह ‘नेपथ्य के रंग’ केवल वाराणसी पर आधारित कला प्रदर्शनी नहीं, बल्कि चेतना, स्मृति, आध्यात्मिकता और अनंतता के अदृश्य परिदृश्य की कलात्मक यात्रा है। श्री बंशीधर प्रतिहारी की परंपरागत कलात्मक साधना और सुश्री आशिमा मेहरोत्रा की समकालीन दृश्य अभिव्यक्ति के माध्यम से यह प्रदर्शनी दर्शकों के सामने उस दुनिया को तलाशने का अवसर रखती है, जो दृश्य रूपों के पीछे विद्यमान है।
यह प्रेस विज्ञप्ति 14 अक्टूबर 2026 को मध्य रेल के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. स्वप्नील निला द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, मुंबई से जारी की गई। जनसंपर्क क्रमांक 2026/10/28 है।

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