भारतीय रेलवे में सुरक्षा का बड़ा बदलाव: 2026-27 में अब तक केवल 2 रेल हादसे, कवच 4.0 और आधुनिक तकनीक से दुर्घटनाओं में ऐतिहासिक गिरावट
भारतीय रेलवे ने सुरक्षा में बड़ा सुधार दर्ज किया है। 2026-27 में जून तक केवल 2 रेल हादसे हुए, जबकि कवच 4.0, आधुनिक तकनीक और सुरक्षा निवेश से बड़ा बदलाव सामने आया।

तस्वीर में दिख रही पटरियों पर चलती एक यात्री ट्रेन, पास में काम करते रेलवे कर्मचारी और प्लेटफॉर्म पर खड़े अधिकारी।
रेल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए भारतीय रेलवे ने आधुनिक तकनीक, बेहतर आधारभूत संरचना और उन्नत रखरखाव व्यवस्था के जरिए सुरक्षा मानकों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। वर्ष 2026-27 में जून 2026 तक भारतीय रेलवे पर केवल 2 परिणामी रेल दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं। 6,671 स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और पूर्ण ट्रैक सर्किटिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है, जबकि 10,395 लेवल क्रॉसिंग गेटों को इंटरलॉक किया गया है ताकि मानवीय त्रुटियों को न्यूनतम किया जा सके। वर्ष 2014 से 2026 के बीच भारतीय रेलवे ने 36,429 ट्रैक किलोमीटर जोड़े, जो 2004-14 की तुलना में 2.5 गुना से अधिक है। इसी अवधि में रोड ओवर ब्रिज (ROB) और रोड अंडर ब्रिज (RUB) की संख्या बढ़कर 14,362 हो गई, जो तीन गुना से अधिक वृद्धि है। एलएचबी कोचों का उत्पादन 2014-26 के दौरान 49,366 तक पहुंच गया, जो 2004-14 की तुलना में 21 गुना से अधिक है, जबकि वेल्ड फेलियर में 93 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। कवच 4.0 को दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा जैसे उच्च घनत्व वाले मार्गों पर 2,490 रूट किलोमीटर पर सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है। इसके अलावा 21,937 रूट किलोमीटर पर कवच प्रणाली के कार्य प्रगति पर हैं तथा 7,435 लोकोमोटिव और 1,200 ईएमयू/एमईएमयू ट्रेनों में इसकी स्थापना की जा रही है।
भारतीय रेलवे में पिछले वर्षों में लागू किए गए विभिन्न सुरक्षा उपायों के परिणामस्वरूप टक्कर और पटरी से उतरने जैसी दुर्घटनाओं सहित कुल परिणामी रेल दुर्घटनाओं में लगातार कमी आई है। वर्ष 2014-15 में 135 परिणामी दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि वर्ष 2025-26 में यह संख्या घटकर 16 रह गई, जो 88 प्रतिशत कम है। वर्ष 2026-27 में जून 2026 तक केवल 2 परिणामी रेल दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं। रेल परिचालन सुरक्षा में सुधार का एक अन्य महत्वपूर्ण पैमाना ‘परिणामी दुर्घटना सूचकांक’ भी लगातार बेहतर हुआ है। वर्ष 2014-15 में यह सूचकांक 0.11 था, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 0.01 रह गया, अर्थात 91 प्रतिशत की कमी। यह सूचकांक सभी ट्रेनों के कुल परिचालन किलोमीटर के अनुपात में परिणामी दुर्घटनाओं की संख्या को दर्शाता है।
भारतीय रेलवे के अनुसार दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में ट्रैक की खराबी, लोकोमोटिव या कोच में दोष, उपकरणों की विफलता तथा मानवीय त्रुटियां शामिल रही हैं। वर्ष 2004-05 से 2013-14 के बीच 1,711 परिणामी रेल दुर्घटनाओं में 904 लोगों की मौत और 3,155 लोग घायल हुए। वर्ष 2014-15 से 2023-24 के दौरान 678 दुर्घटनाओं में 748 लोगों की मौत और 2,087 लोग घायल हुए। वर्ष 2024-25 में 31 दुर्घटनाओं में 18 लोगों की मौत तथा 92 लोग घायल हुए, जबकि वर्ष 2025-26 में 16 दुर्घटनाओं में 17 लोगों की मौत और 27 लोग घायल हुए।
रेल संचालन को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए सुरक्षा संबंधी गतिविधियों पर व्यय भी लगातार बढ़ाया गया है। वर्ष 2013-14 में सुरक्षा संबंधी व्यय 39,200 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2022-23 में 87,336 करोड़ रुपये, वर्ष 2023-24 में 1,01,662 करोड़ रुपये, वर्ष 2024-25 में 1,14,022 करोड़ रुपये, वर्ष 2025-26 में 1,17,693 करोड़ रुपये तथा वर्ष 2026-27 में 1,20,389 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
30 जून 2026 तक 6,671 स्टेशनों पर इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली स्थापित की गई है ताकि सिग्नल और प्वाइंट का केंद्रीकृत संचालन हो सके तथा मानवीय त्रुटियों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सके। इसी अवधि तक 10,395 लेवल क्रॉसिंग गेटों पर इंटरलॉकिंग की व्यवस्था लागू की गई है। 6,671 स्टेशनों पर पूर्ण ट्रैक सर्किटिंग उपलब्ध कराई गई है, जिससे विद्युत माध्यम से ट्रैक पर ट्रेन की उपस्थिति का सत्यापन संभव हो सके। सिग्नलिंग सुरक्षा से जुड़े विषयों जैसे अनिवार्य पत्राचार जांच, परिवर्तन कार्य प्रोटोकॉल और पूर्णता चित्र तैयार करने के संबंध में विस्तृत निर्देश जारी किए गए हैं। एस एंड टी उपकरणों के डिस्कनेक्शन और रिकनेक्शन की निर्धारित प्रक्रिया को भी पुनः लागू करने पर बल दिया गया है।
सभी लोकोमोटिव में विजिलेंस कंट्रोल डिवाइस (VCD) लगाए गए हैं ताकि लोको पायलट की सतर्कता बनी रहे। कोहरे के दौरान सिग्नल की पूर्व सूचना के लिए विद्युतीकृत क्षेत्रों में सिग्नल से पहले ओएचई मास्ट पर रेट्रो-रिफ्लेक्टिव सिग्मा बोर्ड लगाए गए हैं। कोहरे से प्रभावित क्षेत्रों में लोको पायलटों को जीपीएस आधारित फॉग सेफ्टी डिवाइस (FSD) उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे वे सिग्नल, लेवल क्रॉसिंग और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की दूरी जान सकें।
ट्रैक सुरक्षा के लिए 60 किलोग्राम, 90 यूटीएस रेल, प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट स्लीपर, इलास्टिक फास्टनिंग, पीएससी स्लीपर पर फैन शेप टर्नआउट तथा गर्डर पुलों पर स्टील चैनल और एच-बीम स्लीपर का उपयोग किया जा रहा है। ट्रैक बिछाने के कार्य में PQRS, TRT और T-28 जैसी मशीनों का उपयोग कर मानवीय त्रुटियों को कम किया गया है। 130 मीटर और 260 मीटर लंबे रेल पैनलों की आपूर्ति बढ़ाई गई है ताकि जोड़ों की वेल्डिंग कम हो और सुरक्षा बेहतर बने। रेलों की अल्ट्रासोनिक फ्लॉ डिटेक्शन (USFD) जांच, फ्लैश बट वेल्डिंग तकनीक, ट्रैक रिकॉर्डिंग कार (TRC), ऑसिलेशन मॉनिटरिंग सिस्टम (OMS), नियमित ट्रैक पेट्रोलिंग, थिक वेब स्विच और वेल्डेबल सीएमएस क्रॉसिंग जैसी व्यवस्थाएं भी लागू की गई हैं। ट्रैक परिसंपत्तियों की ऑनलाइन निगरानी प्रणाली, एकीकृत ब्लॉक, कॉरिडोर ब्लॉक, मानसून सुरक्षा उपायों और नियमित निरीक्षण के माध्यम से भी सुरक्षा को मजबूत किया गया है।
रेलवे परिसंपत्तियों विशेषकर कोच और वैगनों का निवारक रखरखाव नियमित रूप से किया जा रहा है। पारंपरिक आईसीएफ कोचों के स्थान पर एलएचबी डिजाइन वाले कोच लगाए जा रहे हैं। जनवरी 2019 तक ब्रॉड गेज नेटवर्क पर सभी मानव रहित लेवल क्रॉसिंग समाप्त कर दी गईं। रेलवे पुलों की नियमित जांच कर आवश्यक मरम्मत और पुनर्वास कार्य किया जा रहा है। सभी कोचों में अग्नि सुरक्षा संबंधी वैधानिक सूचना, फायर पोस्टर तथा ज्वलनशील सामग्री न ले जाने, धूम्रपान निषेध और दंड संबंधी जानकारी प्रदर्शित की गई है। नए पावर कार, पेंट्री कार और कोचों में फायर डिटेक्शन एवं स्मोक डिटेक्शन सिस्टम लगाए जा रहे हैं तथा पुराने कोचों में भी इन्हें चरणबद्ध तरीके से स्थापित किया जा रहा है। कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण और परामर्श भी जारी है। 30 नवंबर 2023 की राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से ‘रोलिंग ब्लॉक’ की अवधारणा लागू की गई, जिसके तहत 52 सप्ताह पहले तक रखरखाव कार्यों की योजना बनाई जाती है।
तकनीकी सुधारों के तहत वर्ष 2004-05 से 2013-14 के दौरान 57,450 किलोमीटर उच्च गुणवत्ता की 60 किलोग्राम रेल का उपयोग हुआ था, जबकि वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान यह बढ़कर 1.63 लाख किलोमीटर हो गया, जो 2.8 गुना से अधिक है। 260 मीटर लंबे रेल पैनलों की लंबाई 9,917 किलोमीटर से बढ़कर 87,219 किलोमीटर हो गई। इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग वाले स्टेशन 837 से बढ़कर 3,691 हो गए। फॉग पास सेफ्टी डिवाइस की संख्या 31 मार्च 2014 के 90 से बढ़कर 31 मार्च 2026 तक 31,693 हो गई। थिक वेब स्विच की संख्या शून्य से बढ़कर 35,971 हो गई।
बेहतर रखरखाव के अंतर्गत प्राथमिक रेल नवीनीकरण 32,260 ट्रैक किलोमीटर से बढ़कर 57,583 ट्रैक किलोमीटर हुआ। वेल्ड की यूएसएफडी जांच 79.43 लाख से बढ़कर 2.25 करोड़ हो गई। वर्ष 2013-14 में 3,699 वेल्ड फेलियर दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 272 रह गए, अर्थात 93 प्रतिशत की कमी। रेल फ्रैक्चर की संख्या भी 2,548 से घटकर 208 रह गई, जो 92 प्रतिशत की कमी है।
बेहतर आधारभूत संरचना और रोलिंग स्टॉक के क्षेत्र में वर्ष 2004-05 से 2013-14 के दौरान 14,985 ट्रैक किलोमीटर जोड़े गए थे, जबकि वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच 36,429 ट्रैक किलोमीटर जोड़े गए। आरओबी और आरयूबी की संख्या 4,148 से बढ़कर 14,362 हो गई। 31 मार्च 2014 तक ब्रॉड गेज नेटवर्क पर 8,948 मानव रहित लेवल क्रॉसिंग थीं, जिन्हें 31 जनवरी 2019 तक पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। एलएचबी कोचों का उत्पादन 2,337 से बढ़कर 49,366 तक पहुंच गया।
कवच भारतीय रेलवे की स्वदेशी विकसित ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली है, जिसे उच्चतम सुरक्षा प्रमाणन SIL-4 प्राप्त है। यह प्रणाली निर्धारित गति सीमा के भीतर ट्रेन संचालन सुनिश्चित करती है तथा आवश्यकता पड़ने पर स्वतः ब्रेक लगाकर लोको पायलट की सहायता करती है। फरवरी 2016 में यात्री ट्रेनों पर इसके पहले फील्ड ट्रायल शुरू हुए। स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन के बाद वर्ष 2018-19 में कवच संस्करण 3.2 की आपूर्ति के लिए तीन कंपनियों को स्वीकृति दी गई। जुलाई 2020 में इसे राष्ट्रीय एटीपी प्रणाली के रूप में अपनाया गया। कवच प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक स्टेशन और ब्लॉक सेक्शन पर स्टेशन कवच, पूरे ट्रैक पर आरएफआईडी टैग, दूरसंचार टावर, ऑप्टिकल फाइबर केबल तथा प्रत्येक लोकोमोटिव में लोको कवच की स्थापना शामिल है।
दक्षिण मध्य रेलवे पर 1,465 रूट किलोमीटर में कवच संस्करण 3.2 के अनुभव के आधार पर सुधार किए गए और 16 जुलाई 2024 को अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (RDSO) ने कवच संस्करण 4.0 को मंजूरी दी। इसमें बेहतर लोकेशन सटीकता, बड़े यार्ड में सिग्नल सूचना, स्टेशन-टू-स्टेशन इंटरफेस तथा मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग से सीधा इंटरफेस जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
13 जुलाई 2026 तक कवच संस्करण 4.0 को 2,490 रूट किलोमीटर पर सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है। दिल्ली-मुंबई मार्ग पर 1,344 रूट किलोमीटर में तिलक ब्रिज–जंक्शन केबिन–पलवल–मथुरा–नागदा–वडोदरा–विरार खंड (मंगलमहुडी–पंचपिपलिया को छोड़कर) के 1,248 रूट किलोमीटर तथा वडोदरा–अहमदाबाद खंड के 96 रूट किलोमीटर शामिल हैं। दिल्ली-हावड़ा मार्ग पर 1,146 रूट किलोमीटर में चिपयाना–टूंडला–कानपुर–सूबेदारगंज 563 रूट किलोमीटर, कानपुर–लखनऊ 71 रूट किलोमीटर, डीडीयू (एफओसी)–भभुआ रोड 50 रूट किलोमीटर, सासाराम–फेसर 43 रूट किलोमीटर, गया–सरमतारन–निमियाघाट 159 रूट किलोमीटर तथा छोटा अंबाना–बर्द्धमान–हावड़ा 260 रूट किलोमीटर शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त 21,937 रूट किलोमीटर पर ट्रैक साइड कवच कार्य जारी है। प्रमुख प्रगति के तहत 11,253 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई जा चुकी है, 1,668 दूरसंचार टावर स्थापित किए गए हैं, 958 स्टेशनों पर स्टेशन डेटा सेंटर बनाए गए हैं, 7,721 रूट किलोमीटर पर ट्रैक साइड उपकरण लगाए गए हैं तथा 6,045 लोकोमोटिव में कवच उपलब्ध कराया गया है। 7,435 लोकोमोटिव और 1,200 ईएमयू/एमईएमयू ट्रेनों में कवच लगाने का कार्य भी प्रगति पर है। कवच तकनीक के लिए भारतीय रेलवे के केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं और अब तक 94,000 से अधिक तकनीशियन, ऑपरेटर और इंजीनियर प्रशिक्षित किए जा चुके हैं, जिनमें लगभग 57,000 लोको पायलट और सहायक लोको पायलट शामिल हैं। जून 2026 तक कवच कार्यों पर 3,874.9 करोड़ रुपये व्यय किए जा चुके हैं, जबकि वर्ष 2026-27 के लिए 2,066.24 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
रेल दुर्घटनाओं की जांच नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन रेलवे सुरक्षा आयुक्त (CRS) तथा विभागीय जांच समितियों द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार की जाती है। संबंधित सर्किल के सीआरएस विस्तृत जांच के बाद अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें प्रस्तुत करते हैं, जिन पर संबंधित रेलवे प्रशासन कार्रवाई करता है। इन कार्रवाई रिपोर्टों के माध्यम से पाई गई कमियों को दूर किया जाता है ताकि भविष्य में इसी प्रकार की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। यह जानकारी केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

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