भारत-चीन रिश्तों में जमी बर्फ पिघली: ऐतिहासिक लिपुलेख दर्रे से व्यापार बहाल, क्षेत्रीय रणनीति के लिए बड़ी खबर।
भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक लिपुलेख पास के जरिए व्यापार 6 साल बाद फिर शुरू होने जा रहा है। जून 2026 से दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी। जानें पूरी खबर।

The ice in India-China relations has melted
6 साल का सूखा खत्म! जून 2026 से फिर गुलज़ार होगा भारत-चीन का 'लिपुलेख पास', शुरू होगा व्यापार
पिथौरागढ़ | 20 मार्च, 2026
भारत और चीन के बीच लंबे समय से बनी तनावपूर्ण स्थितियों और कोविड-19 महामारी के कारण बंद ऐतिहासिक व्यापारिक मार्गों में से एक, लिपुलेख पास (Lipulekh Pass), फिर से खुलने जा रहा है। एक बड़े रणनीतिक और व्यापारिक फैसले के तहत, दोनों देशों ने जून 2026 से इस दर्रे के जरिए सीमा पार व्यापार (Cross-border trade) को बहाल करने की घोषणा की है। यह कदम न केवल दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों के लिए अहम है, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में भी एक बड़ा बदलाव लाने वाला है।
लिपुलेख पास और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख पास भारत, चीन (तिब्बत) और नेपाल के त्रिकोणीय बिंदु (Tri-junction point) के पास एक महत्वपूर्ण पहाड़ी दर्रा है।
- प्राचीन व्यापार मार्ग: यह सदियों से भारत और तिब्बत के बीच व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक प्रमुख मार्ग रहा है।
- ट्रेडिंग का इतिहास: भारत और चीन के बीच औपचारिक रूप से सीमा व्यापार 1992 में एक समझौते के बाद शुरू हुआ था। यह व्यापार आमतौर पर हर साल जून से अक्टूबर के बीच होता था, जब बर्फबारी कम होती थी।
क्यों हुआ बंद?
2019 के व्यापार सीजन के बाद, 2020 में गलवान घाटी संघर्ष और फिर कोविड-19 महामारी के कारण इस मार्ग से व्यापार पूरी तरह बंद कर दिया गया था। पिछले 6 सालों से इस दर्रे पर सन्नाटा पसरा हुआ था।
2026 में क्या बदलेगा?
सरकार से मिल रही जानकारी के अनुसार, जून 2026 से व्यापारिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने के लिए जमीनी स्तर पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
- व्यापारियों का पंजीकरण: पिथौरागढ़ और धारचूला जैसे नजदीकी कस्बों में उन व्यापारियों के पंजीकरण की प्रक्रिया जल्द ही शुरू की जाएगी जो इस मार्ग से चीन के साथ व्यापार करना चाहते हैं।
- मंडी का नवीनीकरण: धारचूला में स्थित गूंजी और नाबी जैसी व्यापारिक मंडियों (Trade Marts) को फिर से सक्रिय किया जाएगा। बुनियादी ढांचा, जैसे सड़क और सीमा शुल्क (Customs) केंद्र, को दुरुस्त किया जा रहा है।
- सामान की सूची: पहले की तरह, व्यापारियों को एक निर्धारित सूची के अनुसार ही सामान ले जाने की अनुमति होगी। भारत से कपड़े, कृषि उत्पाद और घरेलू सामान निर्यात किए जाते थे, जबकि चीन से ऊन, पशु और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान आते थे।
क्या है रणनीतिक अहमियत?
लिपुलेख पास सिर्फ एक व्यापारिक मार्ग नहीं है, बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है:
- रिश्तों में सुधार के संकेत: इस मार्ग का खुलना यह दर्शाता है कि दोनों देश लंबे समय से चले आ रहे तनाव को पीछे छोड़कर आर्थिक सहयोग की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। यह एक 'कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर' (CBM) के रूप में देखा जा रहा है।
- क्षेत्रीय विकास: व्यापार शुरू होने से उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
- बॉर्डर पर शांति: व्यापारिक गतिविधियां शुरू होने से सीमा पर हलचल बढ़ेगी, जो एक तरह से तनाव कम करने में मदद कर सकती है, क्योंकि दोनों पक्ष आर्थिक लाभ के लिए स्थिरता चाहेंगे।
क्यों खास है जून 2026 का समय?
जून का महीना इसलिए चुना गया है क्योंकि इस समय तक पहाड़ी दर्रों से बर्फ हट जाती है और रास्ता साफ हो जाता है। 6 साल के अंतराल के बाद व्यापार को बहाल करना एक बड़ी चुनौती है, इसलिए इसे 'पायलट प्रोजेक्ट' की तरह देखा जा सकता है ताकि व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू किया जा सके।
लिपुलेख पास का खुलना उत्तराखंड के व्यापारियों और क्षेत्रीय रणनीति के लिए एक बहुत अच्छी खबर है। यह न केवल पुराने व्यापारिक संबंधों को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि भारत और चीन के बीच एक नई शुरुआत का प्रतीक भी बनेगा। हालांकि, दोनों देशों को इस मार्ग को सुचारू रूप से चलाने के लिए आपसी विश्वास और सुरक्षा चिंताओं को संतुलित करना होगा।

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