भारत ने पड़ोसी देशों के लिए निवेश नियमों को बनाया लचीला, सुरक्षा और समृद्धि के बीच साधा संतुलन

नई दिल्ली | 13 मार्च 2026

भारत सरकार ने अपनी आर्थिक नीतियों में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी बदलाव करते हुए उन देशों से आने वाले विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में ढील दी है, जो भारत के साथ अपनी जमीनी सीमा साझा करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 10 मार्च 2026 को इस संबंध में नए दिशा-निर्देशों को मंजूरी दी। यह कदम विशेष रूप से चीन, नेपाल, भूटान, और बांग्लादेश जैसे देशों से आने वाले निवेश को ध्यान में रखकर उठाया गया है, ताकि भारतीय बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ाया जा सके और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा मिले।

प्रेस नोट 3 (2020) में क्या हुआ बदलाव?

2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान, भारत ने 'प्रेस नोट 3' जारी किया था, जिसके तहत सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले हर निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय कंपनियों के 'अवसरवादी अधिग्रहण' (Opportunistic Takeovers) को रोकना था।

अब, मार्च 2026 में किए गए बदलावों के तहत सरकार ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण रियायतें दी हैं:

1. 10% 'बेनेफिशियल ओनरशिप' की सीमा:

नए नियमों के अनुसार, यदि किसी विदेशी कंपनी में सीमा साझा करने वाले देश (जैसे चीन) की हिस्सेदारी 10% से कम है और उनके पास कंपनी का कंट्रोल (Controlling Rights) नहीं है, तो वे अब बिना सरकारी मंजूरी के 'ऑटोमैटिक रूट' से भारत में निवेश कर सकते हैं।

2. 60 दिनों की समय सीमा (60-Day Deadline):

पहले निवेश के प्रस्तावों को मंजूरी मिलने में महीनों या सालों लग जाते थे। अब सरकार ने विनिर्माण (Manufacturing) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए 60 दिनों की समय सीमा तय की है। इसका मतलब है कि निवेश के आवेदनों पर अब दो महीने के भीतर फैसला लेना अनिवार्य होगा।

3. 'बेनेफिशियल ओनर' की स्पष्ट परिभाषा:

सरकार ने अब 'बेनेफिशियल ओनर' (वास्तविक मालिक) की परिभाषा को और स्पष्ट कर दिया है, जो धन शोधन निवारण नियमों (PMLA) के अनुरूप है। इससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए नियमों को समझना आसान हो गया है।

किन क्षेत्रों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?

सरकार ने फिलहाल कुछ खास क्षेत्रों (Sectors) में इस ढील को प्रमुखता दी है ताकि भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया जा सके:

  • इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स: मोबाइल और लैपटॉप के पुर्जे बनाने वाली कंपनियों को विदेशी तकनीक और पूंजी आसानी से मिल सकेगी।
  • कैपिटल गुड्स: भारी मशीनरी और औद्योगिक उपकरणों के निर्माण में तेजी आएगी।
  • सोलर एनर्जी: सोलर सेल के लिए उपयोग होने वाले पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर (Ingot-wafer) उत्पादन में विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
  • स्टार्टअप्स और डीप-टेक: भारतीय स्टार्टअप्स, जो फंड की कमी से जूझ रहे थे, अब ग्लोबल फंड्स से निवेश प्राप्त कर सकेंगे।

सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं

नियमों में ढील देने के बावजूद, सरकार ने सुरक्षा के मोर्चे पर कोई ढिलाई नहीं बरती है। रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र जैसे सेमीकंडक्टर (Semiconductors) और रक्षा क्षेत्र में अभी भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी। साथ ही, यह भी अनिवार्य किया गया है कि निवेश प्राप्त करने वाली कंपनी का मुख्य नियंत्रण और मालिकाना हक भारतीय नागरिकों या भारतीय संस्थाओं के पास ही रहना चाहिए।

विशेषज्ञों का क्या कहना है?

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव विशेष रूप से उन वैश्विक निवेश फंड्स (PE/VC Funds) के लिए राहत भरा है, जिनमें चीनी निवेशकों की छोटी हिस्सेदारी होती थी। पहले इस छोटी हिस्सेदारी की वजह से पूरा निवेश अटक जाता था। अब 10% की सीमा तय होने से निवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और विदेशी पूंजी का प्रवाह तेज होगा।

13 मार्च 2026 को प्रभावी हुए ये नए नियम भारत की बदलती आर्थिक रणनीति को दर्शाते हैं। भारत अब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाले बिना पड़ोसी देशों की पूंजी और तकनीक का उपयोग अपने विकास के लिए करना चाहता है। यह कदम 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को गति देने और भारतीय फर्मों को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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