भारतीय वायुसेना विकसित करेगी स्वदेशी कामिकेज ड्रोन; 16000 फीट की ऊंचाई पर भरेगा उड़ान
रक्षा मंत्रालय ने घरेलू कंपनियों की मदद से वन-वे अटैक ड्रोन के विकास के लिए टेंडर जारी किया, सुलूर स्थित 5 बेस रिपेयर डिपो को नोडल एजेंसी बनाया गया।

भारतीय वायुसेना द्वारा देश में ही डिजाइन और निर्मित किए जा रहे नए लंबी दूरी के स्वदेशी कामिकेज ड्रोन की एक प्रतीकात्मक तस्वीर
Indian Air Force Kamikaze Drone : वैश्विक युद्धक्षेत्रों में मचे कोहराम और बदलती सैन्य रणनीतियों के बीच भारतीय वायुसेना ने देश की संप्रभुता को अचूक सुरक्षा कवच देने के लिए एक ऐतिहासिक महापरियोजना का शंखनाद कर दिया है। आधुनिक युद्धों में गेमचेंजर साबित हो रहे 'कामिकेज' यानी वन-वे अटैक ड्रोन को अब भारत पूरी तरह से अपनी धरती पर, अपनी तकनीक से विकसित करने जा रहा है। वायुसेना ने भारतीय रक्षा उद्योग के साथ मिलकर इन लंबी दूरी के आत्मघाती ड्रोनों के निर्माण की प्रक्रिया को धरातल पर उतार दिया है, जो 16,000 फीट की दुर्गम ऊंचाइयों पर भी दिन और रात के किसी भी पहर में दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखेंगे। इस अति-महत्वपूर्ण परियोजना के लिए तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित सुलूर के '5 बेस रिपेयर डिपो' को नोडल एजेंसी नियुक्त किया गया है, जो इस पूरे मिशन की कमान संभालेगा।
सैन्य भाषा में 'लोइटरिंग म्यूनिशन' कहे जाने वाले ये कामिकेज ड्रोन असल में आसमान में उड़ते हुए वे अदृश्य शिकारी हैं, जो एक बार उड़ान भरने के बाद वापस नहीं लौटते। ये ड्रोन लक्ष्य क्षेत्र में पहुंचकर पहले बारीकी से दुश्मन की पहचान करते हैं और फिर सीधे उससे टकराकर खुद को उड़ा लेते हैं। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सबसे बड़ी रणनीतिक खूबी इसका कानूनी और बौद्धिक स्वरूप है। रक्षा मंत्रालय के निर्णय के अनुसार, इस पूरे ड्रोन प्लेटफॉर्म के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स यानी आईपीआर पूरी तरह से भारतीय वायुसेना के पास सुरक्षित रहेंगे। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत की घरेलू कंपनियां और देश के उभरते हुए स्टार्टअप्स मिलकर इसे शून्य से डिजाइन और निर्मित करेंगे, जिससे भविष्य में किसी भी विदेशी निर्भरता के बिना सैन्य जरूरतों के हिसाब से इस तकनीक में तत्काल अपग्रेडेशन और बदलाव किए जा सकेंगे।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के इस नए युग की रूपरेखा खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पहले नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव के दौरान देश के सामने रखी थी। उन्होंने वैश्विक संकटों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर ईरान-इजराइल के बीच उपजे हालिया तनाव तक, हर बड़े संघर्ष ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्धों का फैसला ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक ही करेगी। भारत को ड्रोन निर्माण का वैश्विक हब बनाने का आह्वान करते हुए उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि देश को केवल अंतिम उत्पाद तैयार करने तक सीमित नहीं रहना है। ड्रोन के मोल्ड्स, उसके भीतर का जटिल सॉफ्टवेयर, उसका इंजन और पावर देने वाली बैटरी तक, हर एक छोटा-बड़ा पुर्जा भारत में ही बनना चाहिए ताकि वैश्विक स्तर पर चीन जैसे देशों से पुर्जे आयात करने की मजबूरी को हमेशा के लिए खत्म किया जा सके।
भारत का यह रक्षा नवाचार इकोसिस्टम अब केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर करोड़ों के निवेश के साथ आकार ले रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 'इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस' यानी आईडेक्स पहल के तहत अब तक 676 स्टार्टअप्स, एमएसएमई और इनोवेटर्स देश की सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए जुड़ चुके हैं। इस अभियान के तहत 548 रक्षा अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं, जिनमें से 58 अत्याधुनिक प्रोटोटाइप को खरीद के लिए हरी झंडी मिल चुकी है, जिनकी कुल कीमत लगभग 3,853 करोड़ रुपए है। इसके अतिरिक्त, लगभग 2,326 करोड़ रुपए के 45 अन्य खरीद अनुबंध भी पूरे किए जा चुके हैं। भारतीय वायुसेना का यह स्वदेशी कामिकेज ड्रोन प्रोजेक्ट न केवल देश की रणनीतिक स्वतंत्रता को एक नई ऊंचाई देगा, बल्कि आधुनिक सैन्य इतिहास में भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
