अजिंठा गुंफा का 'वो' भित्ती चित्र कैसे बना आधुनिक युद्ध नौका की परिभाषा ? जाने INSV कौंडिन्या का संपूर्ण इतिहास
भारतीय नौसेना के INSV कौंडिन्या ने प्राचीन 'सिलाई तकनीक' और अजंता की कला से प्रेरित डिजाइन के साथ मस्कट तक की अपनी पहली ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर ली है। नारियल के रेशों से सिले इस अनोखे जहाज ने सदियों पुराने समुद्री व्यापार मार्ग को पुनर्जीवित कर दिया है। जानें इस 'स्टिच्ड शिप' की निर्माण तकनीक और इसके रणनीतिक सफर की पूरी कहानी।

Ancient Indian Shipbuilding : भारतीय समुद्री इतिहास में 14 जनवरी 2026 की तारीख स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गई है। भारत के प्राचीन समुद्री कौशल का प्रतीक, नौकायन पोत INSV कौंडिन्या, पोरबंदर से अपनी ऐतिहासिक यात्रा शुरू कर ओमान की राजधानी मस्कट पहुंच चुका है। यह केवल एक जहाज की यात्रा नहीं है, बल्कि भारत की उस खोई हुई 'सिलाई' (Stitched Ship) तकनीक का पुनर्जन्म है, जिसने सदियों पहले भारतीय नाविकों को विश्व विजेता बनाया था।
अजंता के भित्ति चित्रों से हकीकत तक का सफर :
INSV कौंडिन्या का निर्माण किसी आधुनिक ब्लूप्रिंट से नहीं, बल्कि अजंता की गुफा संख्या 17 के उन चित्रों से प्रेरित है जो 5वीं शताब्दी के व्यापारिक जहाजों को दर्शाते हैं। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की परिकल्पना प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और इतिहासकार संजीव सान्याल ने की थी, जिसे भारतीय नौसेना के वास्तुकार कमांडर हेमंत कुमार ने धरातल पर उतारा।
इस जहाज की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण तकनीक है :
- धातु मुक्त निर्माण: प्राचीन भारतीय पद्धति का पालन करते हुए, इस जहाज में लोहे की कीलों का उपयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय, लकड़ी के तख्तों को नारियल के रेशों (Coir) से आपस में सिया गया है।
- प्राकृतिक सीलिंग: तख्तों के बीच के जोड़ों को प्राकृतिक राल (Resin) से सील किया गया है, जो 'युक्ति कल्पतरु' जैसे 11वीं सदी के ग्रंथों में वर्णित शिल्प कौशल को जीवंत करता है।
- सांस्कृतिक प्रतीक: जहाज के पालों पर दो सिर वाले बाज 'गंडाभेरुंडा' और सूर्य की आकृतियाँ अंकित हैं, जबकि इसके धनुष पर 'सिंह याली' का चित्रण भारत की समृद्ध विरासत को दर्शाता है।
साहसिक समुद्री अभियान और तकनीकी परीक्षण :
21 मई 2025 को नौसेना में शामिल होने के बाद, INSV कौंडिन्या ने अपनी पहली ट्रांस-ओशनिक यात्रा 29 दिसंबर 2025 को पोरबंदर से शुरू की। कमांडर विकास शेओरान के नेतृत्व में 13 नाविकों और 4 अधिकारियों का दल पारंपरिक और आधुनिक तकनीक के अनूठे संगम के साथ अरब सागर को पार करने निकला।
जहाज भले ही प्राचीन तकनीक से बना हो, लेकिन इसकी सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए IIT मद्रास के महासागर इंजीनियरिंग विभाग ने इसके जलगतिकीय (Hydrodynamic) व्यवहार का परीक्षण किया। इसके अलावा, लंबी दूरी के संचार के लिए इसमें यूटेलसैट वनवेब सैटेलाइट डिश जैसी आधुनिक तकनीक भी जोड़ी गई है।
आधिकारिक और रणनीतिक महत्व :
यह परियोजना संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और मेसर्स होडी इनोवेशन्स के बीच एक त्रिवार्षिक समझौते का परिणाम है। इस जहाज का नामकरण कौंडिन्य प्रथम के सम्मान में किया गया है, जो पहली शताब्दी के वे महान भारतीय नाविक थे जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया की यात्रा कर फुनन साम्राज्य की स्थापना की थी। संजीव सान्याल के अनुसार, यह प्रयास उन गुमनाम नाविकों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने कांस्य युग से ही वैश्विक व्यापार मार्ग प्रशस्त किए थे।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
