जनरल नरवणे की 'वो' किताब जिसे सरकार छापने नहीं दे रही? क्यों बनी संसद में विवाद का जड़...
संसद में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' को लेकर भारी हंगामा। अग्निपथ योजना और चीन सीमा विवाद पर हुए कथित खुलासों ने केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव पैदा कर दिया है। जानिए क्यों रक्षा मंत्रालय में अटकी यह किताब बनी राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा।

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, संसद में इन दिनों एक ऐसी किताब की गूँज सुनाई दे रही है जो अभी तक मुद्रणालय की मशीनों से निकलकर पाठकों के हाथों तक भी नहीं पहुँची है। भारतीय सेना के 28वें प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की संस्मरण पुस्तिका 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny) ने प्रकाशित होने से पहले ही देश की राजनीति में एक ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना की कमान संभालने वाले जनरल नरवणे का कार्यकाल ऐतिहासिक चुनौतियों और रणनीतिक बदलावों का गवाह रहा है, लेकिन उनकी कलम से निकले शब्द अब एक बड़े विधायी और राष्ट्रीय विवाद का केंद्र बन गए हैं।
इस विवाद की जड़ें उस समय गहरी हुईं जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक पत्रिका में छपे इस अप्रकाशित किताब के कुछ अंशों का हवाला देते हुए सरकार पर तीखे प्रहार किए। सदन में उस वक्त सन्नाटा पसर गया जब 'अग्निपथ योजना' को लेकर जनरल नरवणे के कथित अनुभवों को साझा किया गया। बताया जा रहा है कि जनरल ने अपनी इस किताब में अग्निपथ योजना को सेना के लिए एक 'अचानक लगा झटका' करार दिया है। उनके संस्मरणों के अनुसार, सेना ने केवल 10 प्रतिशत सैनिकों की अल्पकालिक भर्ती का सुझाव दिया था, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा इसे व्यापक बदलाव के साथ लागू कर दिया गया। विपक्ष इसी बिंदु को आधार बनाकर सरकार की सैन्य नीतियों और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठा रहा है।
विवाद का एक अन्य संवेदनशील सिरा चीन के साथ हुए गलवान गतिरोध और कैलाश रेंज की उस भयावह रात से जुड़ा है, जब भारत और चीन के टैंक एक-दूसरे के बिल्कुल सामने खड़े थे। किताब के कथित अंशों में उस रात की जमीनी हकीकत और सरकार के भीतर की कथित दुविधा का वर्णन है, जो विपक्ष के अनुसार सरकार के आधिकारिक रुख से मेल नहीं खाता। इस खुलासे ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे अति-संवेदनशील विषयों पर नई बहस छेड़ दी है। सदन के पटल पर इन दावों के आते ही सत्ता पक्ष ने इसे पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे नियमों का उल्लंघन करार दिया है।
सरकारी पक्ष की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि सेना के पूर्व अधिकारियों को अपने संस्मरण साझा करने के लिए रक्षा मंत्रालय से अनिवार्य सुरक्षा मंजूरी लेनी होती है। वर्तमान में यह पांडुलिपि मंत्रालय के पास समीक्षा के लिए लंबित है, और जब तक इसे आधिकारिक स्वीकृति नहीं मिल जाती, इसके अंशों को सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनाना या उन्हें प्रामाणिक मानना संसदीय परंपराओं के विरुद्ध है। सरकार का तर्क है कि एक ऐसी सामग्री को आधार बनाना जो सार्वजनिक डोमेन में आधिकारिक रूप से मौजूद ही नहीं है, न केवल भ्रामक है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम भरा हो सकता है।
फिलहाल, 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' एक बंद लिफाफे की तरह है जिसके भीतर दबे शब्द सत्ता के गलियारों में हलचल मचा रहे हैं। जहाँ विपक्ष इसे देश की सुरक्षा और सैन्य सुधारों की 'सच्चाई का दस्तावेज' बता रहा है, वहीं सरकार इसे अपुष्ट और प्रक्रियात्मक उल्लंघन मान रही है। यह विवाद केवल एक किताब के प्रकाशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सैन्य स्वायत्तता, राजनीतिक निर्णय और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के जटिल संतुलन को भी रेखांकित करता है। आने वाले समय में रक्षा मंत्रालय की समीक्षा और इस पर होने वाली कानूनी कार्रवाई यह तय करेगी कि जनरल नरवणे की यह 'नियति' वास्तव में जनता के सामने किस रूप में आती है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
