4 आतंकी, 3 तरफ से फायरिंग और अकेला 'शेर'... हिजबुल मुजाहिदीन को घर में घुसकर मारने वाले मेजर मोहित शर्मा की 41 वीं जयंती
मेजर मोहित शर्मा की 48वीं जयंती पर विशेष: वह जांबाज पैरा कमांडो जिसने 'इफ्तिखार भट्ट' बनकर हिजबुल में घुसपैठ की और कुपवाड़ा एनकाउंटर में 4 आतंकियों को ढेर कर अशोक चक्र प्राप्त किया। पढ़ें रोंगटे खड़े कर देने वाली शौर्य गाथा।

भारतीय सेना के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ वीरता का परिचय नहीं, बल्कि अदम्य साहस की मिसाल बन जाते हैं। आज, जब देश मेजर मोहित शर्मा की 48वीं जयंती पर उन्हें नमन कर रहा है, तो उनकी शौर्य गाथा हर भारतीय के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है। 'इफ्तिखार भट्ट' बनकर हिजबुल मुजाहिदीन को चकमा देने से लेकर कुपवाड़ा के घने जंगलों में अंतिम सांस तक लड़ने वाले 1 पैरा (स्पेशल फोर्सेज) के इस अधिकारी की कहानी, कर्तव्य और बलिदान का एक अमर दस्तावेज है।
दुश्मन के घर में सेंध: जब मेजर बने 'इफ्तिखार भट्ट'
मेजर मोहित शर्मा की वीरता का सफर सामान्य नहीं था। दिसंबर 1999 में मद्रास रेजिमेंट में कमीशन पाने वाले मोहित ने 2003 में पैरा कमांडो बनने का कठिन रास्ता चुना। उनकी सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाली कार्रवाई वह थी, जब उन्होंने अपनी पहचान पूरी तरह मिटा दी। एक गुप्त ऑपरेशन के तहत, उन्होंने लंबी दाढ़ी बढ़ाई, स्थानीय कश्मीरी वेशभूषा धारण की और 'इफ्तिखार भट्ट' के नाम से खूंखार आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन में घुसपैठ कर दी।
दुश्मन के बीच रहकर, उन्होंने न केवल आतंकियों का विश्वास जीता, बल्कि खुफिया जानकारी जुटाकर दो शीर्ष कमांडरों को ढेर कर दिया। इस अकल्पनीय साहस के लिए उन्हें सेना मेडल (वीरता) से सम्मानित किया गया था।
कुपवाड़ा का वह खूनी संघर्ष: हफरुदा जंगल में अंतिम युद्ध
21 मार्च 2009 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हफरुदा जंगल में एक भयानक मंजर सामने आया। सुरक्षा बलों को आतंकियों की घुसपैठ की सूचना मिली थी। मेजर मोहित शर्मा अपनी 'ब्रावो असॉल्ट टीम' का नेतृत्व कर रहे थे। घने जंगलों और दुर्गम रास्तों के बीच, घात लगाए बैठे आतंकियों ने तीन दिशाओं से अचानक भीषण गोलीबारी शुरू कर दी।
शुरुआती हमले में चार कमांडो गंभीर रूप से घायल हो गए। अपने साथियों को मौत के मुंह में फंसा देख, मेजर मोहित ने अपनी जान की परवाह किए बिना रेंगते हुए उन्हें सुरक्षित निकाला।
- अदम्य साहस: भारी गोलीबारी के बीच उन्होंने दो घायल साथियों को खींचकर सुरक्षा घेरे में लिया।
- पलटवार: सीने में गोली लगने के बावजूद, वे पीछे नहीं हटे। उन्होंने ग्रेनेड फेंके और दो आतंकियों को मार गिराया।
- सर्वोच्च बलिदान: अंत में, दो और आतंकियों को ढेर करने के बाद, मेजर मोहित शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने कुल चार आतंकियों को मौत के घाट उतारा और अपने साथियों की जान बचाई।
विरासत और सम्मान: 'फॉरएवर 31'
मेजर मोहित शर्मा के इस सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च शांतिदात्री वीरता पुरस्कार 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया। 26 जनवरी 2010 को उनकी पत्नी, मेजर (अब लेफ्टिनेंट कर्नल) रिशिमा सरीन ने यह सम्मान ग्रहण किया। महज 31 वर्ष की आयु में देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले इस वीर की यादें आज भी #Forever31 के रूप में जीवित हैं। दिल्ली मेट्रो स्टेशन का नामकरण और उनके जीवन पर आधारित आगामी फिल्म उनकी अमर गाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
