कौन थीं यशोदा देवी? राजस्थान की पहली महिला विधायक और रियासतकालीन व्यवस्था को चुनौती देने वाली साहसी जननेत्री
सोशलिस्ट पार्टी की नेता यशोदा देवी ने 1953 के उपचुनाव में बांसवाड़ा सीट से जीत दर्ज कर लोकतांत्रिक भारत में पूर्व रियासत की पहली महिला विधायक होने का गौरव पाया।

सन 1927 में उज्जैन के नागदा में जन्मी यशोदा देवी का व्यक्तित्व बचपन से ही जनसेवा और सामाजिक परिवर्तन की भावनाओं से ओत-प्रोत था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान की प्रतिष्ठित संस्था वनस्थली विद्यापीठ और बामनिया स्थित भील आश्रम में हुई, जहाँ के संस्कारों ने उन्हें समाज के वंचित वर्गों और विशेषकर वनवासी समुदाय के प्रति संवेदनशील बनाया। इसी शैक्षणिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ने उन्हें भविष्य के कठिन संघर्षों के लिए तैयार किया, जहाँ उन्होंने रियासतकालीन व्यवस्था की कड़े नियमों और परंपराओं के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की। यशोदा देवी का सार्वजनिक जीवन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि वे महिला अधिकारों की एक सशक्त पैरोकार और शराब जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एक अडिग आंदोलनकारी के रूप में उभरीं।
उनके जीवन का सबसे ऐतिहासिक मोड़ 1953 में आया जब उन्होंने बांसवाड़ा विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में सोशलिस्ट पार्टी की प्रत्याशी के रूप में अपनी दावेदारी पेश की। यह चुनाव साधारण नहीं था क्योंकि इससे पूर्व इस सीट के विधायक का चुनाव अवैध घोषित कर दिया गया था। उस दौर में जब राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नगण्य थी, यशोदा देवी ने कुल पड़े मतों का 63.75 प्रतिशत हासिल कर एक अभूतपूर्व जीत दर्ज की। इस जीत के साथ ही वे किसी पूर्व रियासत से निर्वाचित होने वाली देश की पहली महिला विधायक बनीं, जो तत्कालीन भारतीय राजनीति के लिए एक विस्मयकारी घटना थी। उनके इस सफर में 'अखिल हिंदू वनवासी महिला पंचायत' की अध्यक्ष और महासचिव के रूप में निभाई गई भूमिका ने उन्हें जन-जन से जोड़ा और आदिवासियों के उत्थान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया।
यशोदा देवी का संपूर्ण जीवन संघर्ष, सादगी और सिद्धांतों की मिसाल रहा, जिसके कारण वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत ने उन्हें 'आदर्श नारी' के सम्मान से विभूषित किया। उनके योगदान ने राजस्थान विधानसभा के उस पहले कार्यकाल (1952-1957) को ऐतिहासिक बना दिया, जिसमें बाद में कमला बेनीवाल जैसी अन्य महिला नेत्रियां भी चुनकर आईं। 3 जनवरी 2004 को भले ही यशोदा देवी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन एक ऐसी निर्भीक जननेत्री के रूप में उनकी विरासत आज भी जीवित है, जिसने उस दौर में लोकतंत्र की मशाल जलाई जब समाज बदलाव की राह देख रहा था। उनका जीवन आज भी राजनीति और समाज सेवा में आने वाली महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक अक्षय स्रोत बना हुआ है।

