स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वल्लियप्पन उलगनाथन चिदंबरम पिल्लई, जिन्हें दुनिया वी.ओ.सी. और 'कप्पलोत्तिय तमिज़न' यानी 'जहाज चलाने वाला तमिल' के नाम से जानती है, एक ऐसे अद्वितीय नायक रहे जिन्होंने राष्ट्रवाद को केवल शब्दों तक सीमित न रखकर उसे धरातल पर क्रियान्वित किया। 5 सितंबर 1872 को तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के ओट्टापिडाराम में जन्मे चिदंबरम पिल्लई का बचपन भारतीय संस्कृति और शौर्य की कहानियों के बीच बीता, जहाँ उन्होंने अपनी दादी से शिव और दादा से रामायण की शिक्षा ली। बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी पिल्लई ने न केवल पारंपरिक शिक्षा में दक्षता हासिल की, बल्कि घुड़सवारी, तैराकी और कुश्ती जैसे खेलों में भी निपुण हुए। अपने पिता, अधिवक्ता उलगनट्टन पिल्लई के मार्गदर्शन में उन्होंने कानून की पढ़ाई की और 1894 में वकील के रूप में अपना करियर शुरू किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। चेन्नई में स्वामी विवेकानंद आश्रम से जुड़े संत रामकृष्णंतार से हुई भेंट ने उनके भीतर राष्ट्र सेवा की लौ जला दी, जिसे प्रसिद्ध तमिल कवि भारतीयार की मित्रता ने एक प्रखर ज्वाला में बदल दिया। बाल गंगाधर तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानने वाले पिल्लई ने स्वदेशी आंदोलन को नई ऊंचाई देने के लिए साल 1906 में 'स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी' की स्थापना कर ब्रिटिश नौवहन एकाधिकार की जड़ों पर प्रहार किया।

यह वह दौर था जब समुद्र पर ब्रिटिश कंपनियों का एकतरफा राज था, जिसे चुनौती देने के लिए वी.ओ.सी. ने पूरे भारत का भ्रमण कर पूंजी जुटाई और विदेशी धरती से 'एसएस गैलिया' और 'एसएस लाओ' जैसे जहाज खरीदकर तूतीकोरिन और श्रीलंका के बीच भारतीय ध्वज फहराया। अंग्रेजों ने इस प्रतियोगिता को कुचलने के लिए किराए में भारी कटौती की और मुफ्त सुविधाएं तक दीं, लेकिन पिल्लई के अडिग राष्ट्रवाद के सामने उनकी हर चाल विफल रही। पिल्लई केवल व्यापारिक मोर्चे पर ही सक्रिय नहीं थे, बल्कि उन्होंने 1908 में कोरल मिल के श्रमिकों के शोषण के विरुद्ध एक ऐतिहासिक हड़ताल का नेतृत्व किया, जिसने ब्रिटिश प्रबंधन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। उनकी इन बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों से भयभीत होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और दोहरे आजीवन कारावास यानी 40 वर्ष की कठोर सजा सुनाई। जेल की सलाखों के पीछे उन्हें एक राजनीतिक कैदी के बजाय सामान्य अपराधी की तरह रखा गया, जहाँ उनसे कोल्हू के बैल की जगह तेल पेरने का अमानवीय कार्य करवाया गया। भीषण यातनाओं के कारण उनका स्वास्थ्य तो बिगड़ा, लेकिन उनका मनोबल कभी नहीं टूटा। हालांकि 1912 में उनकी रिहाई तक उनकी स्वदेशी कंपनी दिवालिया हो चुकी थी और उनका वकालत का लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया था, फिर भी उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों को साहित्य और लेखन के माध्यम से देश सेवा में समर्पित कर दिया।

वल्लियप्पन उलगनाथन चिदंबरम पिल्लई का जीवन भारतीय स्वाभिमान और त्याग की वह पराकाष्ठा है जो हमें सिखाती है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी अनिवार्य है। उनके संघर्षों का ही परिणाम था कि स्वतंत्रता के पश्चात उन्हें वह सम्मान मिला जिसके वे हकदार थे। भारत सरकार द्वारा उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किए गए और तूतीकोरिन बंदरगाह सहित कई स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं स्थापित की गईं। वह कोल्हू जिसे उन्होंने जेल में बैल की तरह खींचा था, आज चेन्नई के गांधी मंडपम में उनके अदम्य साहस के प्रतीक के रूप में संरक्षित है। वी.ओ.सी. का बलिदान और उनकी दूरदृष्टि आज भी हर भारतीय को आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है, जो उन्हें भारतीय इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर बनाती है।

Pratahkal HQ

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