भारतीय इतिहास में रणथंभौर के शासक राव हम्मीर देव चौहान का नाम एक ऐसे वीर के रूप में अमर है, जिन्होंने शरणागत की रक्षा और अपने स्वाभिमान के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। पृथ्वीराज चौहान के वंशज और महाराजा जैत्रसिंह व हीरा देवी के प्रतापी पुत्र हम्मीर देव ने 1282 ईस्वी में रणथंभौर की सत्ता संभाली और अपने अठारह वर्ष के शासनकाल में चौहान वंश की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया। उन्हें 'हठी हम्मीर' और चौहान काल का 'कर्ण' भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने जिस बात का संकल्प लिया, उससे वे कभी पीछे नहीं हटे। उनके पिता जैत्रसिंह ने उनकी योग्यता को देखते हुए अपने जीवित रहते ही उन्हें राजतिलक कर दिया था, जिसके बाद हम्मीर ने दिग्विजय अभियान चलाकर धार के राजा भोज परमार, मांडलुगढ़ के जयसिंह और आबू के प्रताप सिंह जैसे शक्तिशाली शासकों को पराजित कर अपने साम्राज्य का विस्तार उज्जैन से मथुरा और मालवा से अर्बुदाचल तक किया। भगवान शिव के परम भक्त हम्मीर देव ने अपने शासन के दौरान अश्वमेध और कोटियजन जैसे महान यज्ञों का अनुष्ठान कर अपनी आध्यात्मिक और राजनीतिक शक्ति का परिचय दिया, जिसकी पुष्टि नयचंद्र सूरी के 'हम्मीर महाकाव्य' और जोधराज के 'हम्मीर रासो' जैसे ग्रंथों से होती है।

हम्मीर देव का वास्तविक संघर्ष दिल्ली के खिलजी सुल्तान जलालुद्दीन और बाद में अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुआ। जलालुद्दीन ने रणथंभौर को जीतने के कई असफल प्रयास किए, लेकिन हम्मीर की सैन्य कुशलता के आगे उसे बार-बार पीछे हटना पड़ा। संघर्ष की चरम स्थिति तब आई जब अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मद शाह और कामरू ने हम्मीर देव की शरण ली। क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए हम्मीर ने सुल्तान की मांगों को ठुकरा दिया और शरणार्थियों को सौंपने से मना कर दिया, जिससे क्रोधित होकर अलाउद्दीन ने 1301 ईस्वी में एक विशाल सेना के साथ रणथंभौर का घेरा डाल दिया। महीनों चले इस घेरे के दौरान जब सुल्तान को सैन्य सफलता नहीं मिली, तो उसने छल का सहारा लिया और हम्मीर के सेनापतियों रणमल और रतिपाल को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। किले के भीतर रसद की कमी और विश्वासघात की सूचना के बीच हम्मीर देव ने केसरिया बाना पहनकर अंतिम युद्ध का निश्चय किया। युद्ध के दौरान एक भीषण गलतफहमी के कारण जब रानियों ने शत्रु के झंडे किले की ओर आते देखे, तो महारानी रंगदेवी के नेतृत्व में वीरांगनाओं ने जल जौहर कर लिया। अपनी प्रिय रानी और पुत्री पद्मला के बिछोह और युद्ध की विभीषिका के बीच हम्मीर देव ने अद्वितीय वीरता दिखाई और अंततः अपना शीश काटकर भगवान शिव के चरणों में अर्पित कर दिया।

हम्मीर देव चौहान का बलिदान भारतीय संस्कृति में अडिग संकल्प और शरणागत की रक्षा का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। उनके बारे में प्रचलित प्रसिद्ध उक्ति 'सिंह सवन सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार। तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।।' आज भी उनके हठ और सिद्धांतप्रियता की गवाही देती है। हम्मीर ने न केवल दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा, बल्कि अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद और स्वाभिमान का एक ऐसा मानदंड स्थापित किया, जिससे बाद के काल में महाराणा प्रताप जैसे महान शासकों को भी प्रेरणा मिली।

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