गुरु नानक देव जी के अनन्य भक्त और सिख धर्म के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति और दूरदर्शिता से न केवल गुरुमत विचारधारा को सुदृढ़ किया, बल्कि पंजाब के सांस्कृतिक और शैक्षणिक उत्थान में भी युगांतरकारी भूमिका निभाई।

सिख इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में गुरु अंगद देव जी का व्यक्तित्व एक ऐसे समर्पित साधक के रूप में अंकित है, जिन्होंने अपनी सेवा और अटूट श्रद्धा से 'लहना' से 'अंगद' बनने तक का आध्यात्मिक सफर तय किया। उनका जन्म 10 अप्रैल, 1504 (संवत 1561) को पंजाब के फिरोजपुर जिले के हरिके नामक गांव में एक व्यापारी श्री फेरू जी और माता रामो देवी जी के घर हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम भाई लहना था। बचपन से ही धर्मपरायण रहे भाई लहना प्रारंभ में सनातन धर्म की मान्यताओं से प्रभावित थे और प्रतिवर्ष भक्तों के एक समूह का नेतृत्व कर ज्वालामुखी मंदिर की यात्रा पर जाया करते थे। समय के चक्र के साथ, 1520 में उनका विवाह माता खीवी जी से हुआ, जिनसे उन्हें दो पुत्र—दासु जी व दातू जी, और दो पुत्रियाँ—अमरो जी व अनोखी जी प्राप्त हुईं। विदेशी आक्रमणकारियों और डाकुओं के भय के कारण उनका परिवार अपने पैतृक गांव को छोड़कर अमृतसर के पास ब्यास नदी के तट पर स्थित खडूर साहिब में बस गया।

भाई लहना के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने गुरु नानक देव जी के एक सिख भाई जोधा जी के मुख से गुरुवाणी के शब्द सुने। उन शब्दों में निहित गहराई और दर्शन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने तत्काल कार्तपुर जाकर गुरु नानक देव जी के दर्शन करने का निर्णय लिया। उनकी पहली ही भेंट ने उनके जीवन का कायाकल्प कर दिया; गुरु नानक जी ने उन्हें समझाया कि ईश्वर किसी मूर्ति में नहीं बल्कि निराकार रूप में स्वयं के भीतर व्याप्त है। इस आत्म-साक्षात्कार ने उन्हें गुरु नानक देव जी का ऐसा अनन्य शिष्य बनाया कि उन्होंने स्वयं को पूरी तरह गुरु सेवा में समर्पित कर दिया। उनकी इसी निष्ठा और आध्यात्मिक प्रखरता को देखते हुए, 7 सितंबर, 1539 को गुरु नानक देव जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुनते हुए 'अंगद' नाम दिया, जिसका अर्थ था उनके अपने शरीर का अंग।

गुरु नानक देव जी के ज्योति जोत समाने के बाद, गुरु अंगद देव जी ने खडूर साहिब को अपना केंद्र बनाया और गुरुमत के प्रचार-प्रसार को एक नई वैज्ञानिक और सामाजिक दिशा दी। उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि गुरुमुखी लिपि का मानकीकरण और परिमार्जन था। उन्होंने गुरु नानक देव जी द्वारा प्रयुक्त अक्षरों को संशोधित कर उसे एक सरल और व्यवस्थित रूप दिया, जिससे आम जनमानस के लिए शिक्षा और आध्यात्मिकता के द्वार खुल गए। बच्चों की शिक्षा में उनकी विशेष रुचि थी, जिसके लिए उन्होंने अनेक शिक्षण केंद्रों की स्थापना की। शारीरिक स्वास्थ्य को आध्यात्मिक प्रगति के समान महत्व देते हुए उन्होंने युवाओं के लिए 'मल्ल अखाड़ा' की परंपरा शुरू की, जहाँ शारीरिक सौष्ठव के साथ-साथ आत्मिक अनुशासन का पाठ भी पढ़ाया जाता था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने भाई बाला जी से गुरु नानक देव जी के जीवन प्रसंगों को जानकर उनकी पहली जीवनी तैयार करवाई और स्वयं 63 श्लोकों की रचना की, जो आज गुरु ग्रंथ साहिब में सुशोभित हैं। उन्होंने 'गुरु का लंगर' प्रथा को और अधिक सशक्त बनाया, जिससे समाज में जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाने में सहायता मिली।

अपने जीवन के अंतिम काल में, गुरु अंगद देव जी ने गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित परंपरा का निर्वहन करते हुए अपनी देह त्यागने से पूर्व अमर दास जी की सेवा और समर्पण को पहचानकर उन्हें गुरु पद की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने खडूर साहिब के निकट गोइंदवाल नामक नए नगर की नींव भी रखी। 8 अप्रैल, 1552 को 48 वर्ष की आयु में गुरु अंगद देव जी ज्योति जोत समा गए, लेकिन उनके द्वारा स्थापित गुरुमुखी लिपि, शैक्षणिक संस्थान और लंगर की मर्यादा ने सिख धर्म को एक विशिष्ट संगठित पहचान प्रदान की। उनका जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि पूर्ण समर्पण और सेवा भाव से एक साधारण व्यक्ति भी आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छूकर युग प्रवर्तक बन सकता है।

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