कौन थे भरत चक्रवर्ती? वह प्रतापी सम्राट जिनके नाम पर भारतवर्ष की पहचान हुई और जिन्होंने साम्राज्य को त्यागकर वैराग्य का मार्ग चुना।
भगवान ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत ने अखंड साम्राज्य की स्थापना की और अंततः राजपाठ त्यागकर मोक्ष मार्ग अपना लिया, जिनके नाम पर देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

जैन पुराणों और आदिपुराण जैसे महान ग्रंथों के आलोक में सम्राट भरत चक्रवर्ती का व्यक्तित्व एक ऐसे महाप्रतापी शासक का है जिन्होंने न केवल अखंड साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि अध्यात्म के शिखर को भी छुआ। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और माता यशवती के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जन्मे भरत इस हुंडा अवसर्पिणी काल के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके जन्म से पूर्व उनकी माता ने छह मंगलकारी स्वप्न देखे थे, जिनका अर्थ बताते हुए स्वयं ऋषभदेव ने यह भविष्यवाणी की थी कि यह बालक संपूर्ण विश्व का विजेता बनेगा। न्याय और नीति की शिक्षा में निपुण भरत का व्यक्तित्व बचपन से ही विलक्षण था और उनकी बुद्धिमत्ता का प्रमाण उनके द्वारा स्थापित शासन प्रणालियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जब भगवान ऋषभदेव ने राजपाठ त्यागकर दिगंबर दीक्षा लेने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अपने सौ पुत्रों में राज्य का विभाजन कर दिया, जिसमें भरत को अयोध्या का राज्य प्राप्त हुआ। भरत की महत्वाकांक्षा केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, उन्होंने अपनी विश्व-विजय यात्रा का आरंभ किया और सुदर्शन चक्र जैसे दैवीय रत्नों के बल पर समस्त दिशाओं को जीतकर प्रथम चक्रवर्ती होने का गौरव प्राप्त किया। उनके पास सात अनमोल रत्न और अपार सैन्य शक्ति थी, किंतु उनकी यह विजय यात्रा केवल शस्त्रों के बल पर नहीं, बल्कि नीति और धर्म के आधार पर टिकी थी।
इतिहास का सबसे रोचक मोड़ तब आया जब भरत के ९८ भाइयों ने उनकी अधीनता स्वीकार करने के बजाय वैराग्य धारण कर लिया, किंतु बाहुबली ने उन्हें चुनौती दी। दोनों के मध्य हुए दृष्टि युद्ध, जल युद्ध और मल्ल युद्ध में बाहुबली विजयी रहे, किंतु विजय के उस क्षण में ही बाहुबली को संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उन्होंने अपना राज्य भरत को सौंपकर आत्म-कल्याण का मार्ग चुन लिया। भरत चक्रवर्ती ने अपने शासनकाल में कर्म युग की शुरुआत की और समाज के संचालन के लिए दंड नीति और वर्ण व्यवस्था का सूत्रपात किया, जो तत्कालीन समय में पूर्णतः कर्म और योग्यता पर आधारित थी। उनके पास अवधि ज्ञान जैसी अलौकिक शक्तियां थीं, फिर भी उन्होंने एक आदर्श राजा की भांति प्रजा का पालन किया। अंततः, जीवन के संध्याकाल में जब उन्हें संसार की शून्यता का अनुभव हुआ, तब उन्होंने मोह-माया का त्याग कर अपने पुत्र को उत्तराधिकार सौंपा और स्वयं दिगंबर मुनि बनकर आत्म-साधना में लीन हो गए। उनकी कठोर तपस्या के फलस्वरूप उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति की। आज भी श्रवणबेलगोला से लेकर मंगलगीरी तक उनके प्रति श्रद्धा का केंद्र बने मंदिर उनकी अमर गाथा सुनाते हैं। सम्राट भरत का सबसे महान प्रभाव इस देश के नाम 'भारतवर्ष' के रूप में चिरकाल तक सुरक्षित है, जो उनके न्यायप्रिय शासन और गौरवशाली विरासत का जीवंत प्रतीक है।

