क्या था जेआरडी और रतन टाटा का रिश्ता? जानिए क्यों जेआरडी ने उन्हें चुना अपना उत्तराधिकारी
टाटा साम्राज्य के दो दिग्गजों जेआरडी और रतन टाटा के बीच छिपे उस गहरे रिश्ते की कहानी, जिसने भारतीय उद्योग जगत का इतिहास बदल दिया। जानिए कैसे एक गोद लिए बेटे के परिवार से शुरू हुआ रिश्ता देश के सबसे बड़े उत्तराधिकार की गाथा बना।

जेआरडी टाटा और रतन टाटा
मुम्बई: भारतीय उद्योग जगत के इतिहास में कुछ रिश्ते केवल पारिवारिक कड़ियों से नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक भविष्य को बदलने वाले सिद्धांतों से तय होते हैं। टाटा साम्राज्य के दो सबसे महान स्तंभों—जेआरडी टाटा और रतन टाटा—के बीच का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था। अलग-अलग शाखाओं से आने वाले इन दोनों दिग्गजों के बीच का जुड़ाव एक दूर के पारिवारिक संबंध से शुरू होकर एक ऐसे गहरे गुरु-शिष्य और आत्मीय बंधन में बदल गया, जिसने भारतीय कॉर्पोरेट जगत के इतिहास में सबसे सुचारू और ऐतिहासिक सत्ता हस्तांतरण का मार्ग प्रशस्त किया।
इस महान घराने की पारिवारिक कड़ियों की पड़ताल करें, तो रतन टाटा के पिता नवल टाटा, मूल रूप से जेआरडी टाटा के चचेरे भाई (कजिन) थे। नवल टाटा का जन्म टाटा परिवार की ही एक बेहद दूर की शाखा में हुआ था और उनकी जैविक नानी कूर्वरबाई राव, टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा की पत्नी हीराबाई टाटा की सगी बहन थीं। इस तरह नवल टाटा जन्म से ही व्यापक टाटा परिवार का हिस्सा थे, लेकिन पिता होर्मुसजी टाटा के असामयिक निधन के बाद उनके परिवार को अत्यधिक गरीबी का सामना करना पड़ा। इस विपरीत परिस्थिति में जमशेदजी टाटा के छोटे बेटे सर रतन टाटा की निःसंतान विधवा, नवजबाई टाटा की नजर इस बालक पर पड़ी। अपने पति के रिश्तेदारों को इस स्थिति में देखकर उन्होंने नवल को गोद ले लिया और अपने बेटे की तरह उनका पालन-पोषण किया। नवल टाटा ने आगे चलकर टाटा समूह की कई कंपनियों में निदेशक के रूप में सेवाएं दीं और देश के लिए पद्म भूषण सम्मान भी प्राप्त किया। नवल टाटा की पहली पत्नी सूनी कमिश्रिएट से उन्हें दो बेटे हुए, जिनमें से एक रतन नवल टाटा थे।
जैविक और पारिवारिक संबंधों से परे, जेआरडी टाटा और रतन टाटा का वास्तविक जुड़ाव उनके पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में देखने को मिला। जेआरडी टाटा, रतन टाटा के सबसे बड़े मार्गदर्शक और गुरु बनकर उभरे। रतन टाटा अक्सर उनके साथ अपने कामकाजी और व्यक्तिगत तालमेल को याद करते हुए कहते थे कि उनका रिश्ता "एक पिता और एक भाई" जैसा था। शुरुआती दिनों में जब रतन टाटा को लेकर व्यापारिक गलियारों में संशय व्यक्त किया जा रहा था, तब जेआरडी टाटा ही उनके सबसे बड़े संबल बने। उन्होंने रतन टाटा को निखारा, कॉर्पोरेट की बारीकियां सिखाईं और भविष्य के वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार किया।
इस गहरे आत्मीय और रणनीतिक रिश्ते का सबसे निर्णायक मोड़ साल 1991 में आया। जेआरडी टाटा ने स्वेच्छा से टाटा समूह के अध्यक्ष पद से हटने का फैसला किया और अपनी जगह देश के इस सबसे बड़े व्यापारिक साम्राज्य की कमान सौंपने के लिए व्यक्तिगत रूप से रतन टाटा का चयन किया। इस उत्तराधिकार के बाद, जेआरडी टाटा ने नेतृत्व में किसी भी तरह का हस्तक्षेप न करने की एक नई मिसाल पेश की। वे नियंत्रण की भावना से पूरी तरह दूर हो गए और कंपनी के भीतर रतन टाटा के सबसे बड़े समर्थक और विश्वसनीय सलाहकार बने रहे। जेआरडी टाटा के इसी भरोसे और मार्गदर्शन की बदौलत रतन टाटा ने शुरुआती चुनौतियों को पार करते हुए टाटा समूह को एक विशाल और आधुनिक वैश्विक समूह में तब्दील कर दिया।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
